दीपावली के पाँच दिन क्यों खास होते हैं?।। five Days of Diwali.
मित्रों, दीपावली वैदिक सनातन धर्म का एक प्रमुख त्यौहार माना जाता है। दीपावली स्वच्छता अभियान का भी त्यौहार माना जाता है। इस त्यौहार के आने से पहले घरों की पुताई करवाई जाती है। दीपावली में उबटन से स्नान कर नए-नए कपड़े पहने जाते हैं। सभी ओर साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दौरान दीप जलाना, रंगोली बनाना, माता लक्ष्मी की पूजा करना, मिठाई बांटना, अच्छे-अच्छे पकवान बनाना और नई-नई वस्तुएं खरीदने का भी बहुत ही महत्व होता है।। सनातन धर्म के इस प्रमुख त्यौहार दीपावली का उत्सव 5 दिनों तक चलता है। दक्षिण भारत और उत्तर भारत में इस त्यौहार को अलग-अलग दिन और तरीके से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में दिवाली के 1 दिन पहले यानी नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इस दिन मनाया जाने वाला उत्सव दक्षिण भारत के दिवाली उत्सव का सबसे प्रमुख दिन होता है। जबकि उत्तर भारत में यह त्यौहार 5 दिन का होता है। यह मुख्य रूप से धनतेरस से शुरू होकर नरक चतुर्दशी, मुख्य पर्व दीपावली, गोवर्धन पूजा से होते हुए भाई दूज पर समाप्त होता है। आइये इन पांचों दिनों के बारे में संक्षिप्त में जानते हैं।।इस त्यौहार के पहले दिन को धनतेरस कहते हैं। दीपावली महोत्सव की शुरुआत धनतेरस से होती है। इसे धन त्रयोदशी भी कहते हैं। धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज, धन के देवता कुबेर और आयुर्वेद के मुख्य आचार्य भगवान धन्वंतरि की पूजा का महत्व होता है। इसी दिन समुद्र मंथन में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे। उनके साथ आभूषण एवं बहुमूल्य रत्न भी समुद्र मंथन से प्राप्त हुए थे। तभी से इस दिन का नाम "धनतेरस" पड़ा और इस दिन बर्तन, धातु एवं आभूषण आदि खरीदने की परंपरा शुरू हुई।।
धनतेरस पंच दिवसीय दीपावली उत्सव का प्रथम दिन होता है। समुद्र मंथन के क्रम में कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि को ही धन की देवी माता लक्ष्मी भी समुद्र मंथन से ही प्रकट हुई थीं। इसीलिए इसे धनतेरस या धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। इसी दिन देव लोक के वैद्य भगवान धन्वन्तरि भी अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे। अत: इसी दिन धन्वन्तरी जयंती भी मनाई जाती है। धनतेरस के दिन लक्ष्मी पूजन एवं यम देव के पूजन का भी विधान है।।
इस त्यौहार के दूसरे दिन को नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और काली चौदस कहते हैं। इसी दिन नरकासुर का वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने 16,100 कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई जाती है। इस दिन को लेकर मान्यता है, कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उबटन लगाकर फिर स्नान करने से समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। वहीं इस दिन से एक और मान्यता जुड़ी हुई है। जिसके अनुसार इस दिन उबटन लगाने से रूप एवं सौंदर्य में वृद्धि होती है।। इस त्यौहार के तीसरे दिन को 'दीपावली' कहते हैं। यह दीपावली ही इन पाँच दिनों का मुख्य पर्व होता है। दीपावली का पर्व विशेष रूप से मां लक्ष्मी के पूजन का पर्व होता है। कार्तिक मास की अमावस्या को ही समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। जिन्हें धन, वैभव, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। अत: इस दिन मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए दीप जलाए जाते हैं। ताकि अमावस्या की रात के अंधकार में दीपों से वातावरण रोशन हो जाए।। दूसरी मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान रामचन्द्रजी माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर घर लौटे थे। भगवान श्रीराम के स्वागत हेतु अयोध्यावासियों ने घर-घर दीप जलाए थे। अयोध्यावासियों ने घर-घर दीप जलाकर नगरभर को आभायुक्त कर दिया था। तभी से दीपावली के दिन दीप जलाने की परंपरा है। 5 दिवसीय इस पर्व का प्रमुख दिन लक्ष्मी पूजन अथवा दीपावली होता है।। इस दिन रात्रि को धन की देवी माता लक्ष्मी माता का पूजन विधिपूर्वक करना चाहिए। साथ ही घर के प्रत्येक स्थान को स्वच्छ करके वहां दीपक लगाना चाहिए। जिससे घर में लक्ष्मी का वास एवं दरिद्रता का नाश होता है। इस दिन देवी माता लक्ष्मी, भगवान गणेश तथा द्रव्य, आभूषण आदि का पूजन करके 13 अथवा 26 दीपकों के मध्य 1 तेल का दीपक रखकर उसकी चारों बातियों को प्रज्वलित करना चाहिए। साथ ही दीपों को एक कतार में सजाकर दीपमालिका का पूजन करके उन दीपों को घर में प्रत्येक स्थान पर रखें एवं 4 बातियों वाला दीपक रातभर जलता रहे, ऐसा प्रयास करें।।
इस त्यौहार के चौथे दिन अन्नकूट या गोवर्धन पूजा होती है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट उत्सव मनाना जाता है। इसे पड़वा या प्रतिपदा भी कहते हैं। खासकर इस दिन घर के पालतू बैल, गाय, बकरी आदि को अच्छे से स्नान कराकर उन्हें सजाया जाता है। फिर इस दिन घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन बनाए जाते हैं और उनका पूजन कर पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन को लेकर मान्यता है, कि त्रेतायुग में जब इन्द्रदेव ने गोकुलवासियों से नाराज होकर मूसलधार बारिश शुरू कर दी थी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर गोकुलवासियों को गोवर्धन की छांव में सुरक्षित किया। तभी से इस दिन गोवर्धन पूजन की परंपरा भी चली आ रही है।।
इस त्यौहार के पांचवें दिन को भाई दूज या यम द्वितीया भी कहते हैं। भाई दूज, पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का अंतिम दिन होता है। भाई दूज का पर्व भाई-बहन के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने और भाई की लंबी उम्र के लिए मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन भाई अपनी बहन को अपने घर बुलाता है। जबकि भाई दूज पर बहन अपने भाई को अपने घर बुलाकर उसे तिलक कर भोजन कराती है। साथ ही उसके लंबी उम्र की कामना करती है।। भाई दूज को लेकर मान्यता है, कि यमराज अपनी बहन यमुनाजी से मिलने के लिए उनके घर आए थे। तब यमुनाजी ने उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया एवं यह वचन लिया कि इस दिन हर साल वे अपनी बहन के घर भोजन के लिए पधारेंगे। साथ ही जो बहन इस दिन अपने भाई को आमंत्रित कर तिलक करके भोजन कराएगी, उसके भाई की उम्र लंबी होगी। तभी से भाई दूज पर यह परंपरा बन गई।।ज्योतिष के सभी पहलू पर विस्तृत समझाकर बताया गया बहुत सा हमारा विडियो हमारे YouTube के चैनल पर देखें। इस लिंक पर क्लिक करके हमारे सभी विडियोज को देख सकते हैं - Click & Watch My YouTube Channel.
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