सौभाग्य एवं धन प्राप्ति हेतु महिलाएं मातृनवमी का श्राद्ध अवश्य करें।। Matru Navami Vrat Ka Labh.
नवमी तिथि का श्राद्ध पक्ष में बहुत ही महत्व होता है। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार श्राद्ध करने के लिए एक पूरा पखवाडा ही निश्चित कर दिया गया है। सभी तिथियां इन पन्द्रह (एक पुर्णिमा को लेकर सोलह) दिनों में आ जाती है। किसी के भी कोई भी पूर्वज जिस तिथि को इस लोक को त्यागकर परलोग गया हो, उसी तिथि को इस पक्ष में श्राद्ध किया जाता है। परंतु स्त्रियों को इस पक्ष में भी विशेष स्थान दिया गया है। स्त्रियों के लिए नवमी तिथि विेशेष मानी गयी है। जिसे मातृ नवमी कहा जाता है।।मातृ नवमी के दिन पुत्रवधुएं अपनी स्वर्गवासी सास एवं माता के सम्मान के लिए श्रद्धाजंलि अर्पण करती है। साथ ही सभी प्रकार के धार्मिक कृत्यों को विशेष रूप से करती है। इस दिन पति के रहते संसार छोडने वाली महिलाओं का भी श्राद्ध किया जाता है। साथ ही कुल में सभी दिवंगत हुई महिलाओं का भी इसी दिन श्राद्ध करने का प्रावधान है। अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि पर पितृगणों की प्रसन्नता हेतु नवमी का श्राद्ध करने का विधान बताया गया है।।
पंचांग के अनुसार इस वर्ष मातृ नवमी का श्राद्ध 07 अक्टूबर 2026 दिन शनिवार को पड़ रहा है। यह दिन माता और परिवार की विवाहित महिलाओं (जो गुजर चुकी हैं) के श्राद्ध के लिए श्रेष्ठ मानी जाती हैं। कुछ स्थानों पर इसे डोकरा नवमी भी कहा जाता है। नवमी तिथि का श्राद्ध मूल रूप से माता के निमित्त किया जाता है। कहीं-कहीं पुत्रवधुएं नवमी का व्रत भी रखती है। यदि उनकी सास अथवा माता जीवित नही है तो। शास्त्रानुसार नवमी का श्राद्ध करने पर श्राद्धकर्ता को धन, सम्पत्ति एवं ऐश्वर्य की सहज ही प्राप्ति होती है।।
शास्त्रानुसार मातृनवमी का श्राद्ध करनेवाली स्त्रियों का सौभाग्य जीवन पर्यन्त बना रहता हैं। नवमी के दिन श्राद्ध में पांच ब्राम्हणों और एक ब्राम्हणी को भोजन करवाने का विधान है। सर्व प्रथम नित्यकर्म से निवृत्त होकर घर की दक्षिण दिशा में हरा वस्त्र बिछा कर चित्र या मृतात्माओं का प्रतीक हरे वस्त्र पर स्थापित कर उनके निमित, तिल के तेल का दीपक जलाएं। धूप-दीप जलाकर जल, कुशा और तिल लेकर तर्पण करने तथा अपने पितरों के समक्ष तुलसी पत्र समर्पित करने का प्रावधान है।।
साथ ही भागवत गीता के नवें अध्याय का पाठ भी करना चाहिए। ब्राम्हणों को भोजन के उपरान्त यथाशक्ति वस्त्र, धन, दक्षिणा देकर उनको विदा करने से पूर्व आर्शीवाद ग्रहण करना चाहिये। सदा सुहागिन रहने का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सनातन धर्म की सभी महिलाएं मातृ नवमी का श्राद्ध ज़रूर करें।।
मित्रों, 30 सितंबर 2026 से ही पितृ पक्ष का आरंभ हो चुका है। जिसके बाद से देश के हर कोने में श्राद्ध, पिंडदान एवं पितर तर्पण करने का सिलसिला शुरू हो गया। शास्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में पूवर्जों एवं अपने परिवार के मृत लोगों की शांति तथा आत्मा की तृप्ति के लिए कर्म-कांड किया जाता रहा है। हिंदू धर्म के पुराणों और शास्त्रों आदि में पितृ पक्ष की तिथियों का वर्णन किया गया है। जिसकी माध्यम से हमें जानकारी मिलती है कि उसे किस दिन किसी श्राद्ध करना चाहिए।।
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि यानि मातृ नवमी के दिन श्राद्ध करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार इस तिथि के दिन माता और परिवार की दिवंगत हो गई सुहागिन महिलाओं का श्राद्ध किया जाता है। धार्मिक किवंदतियों के अनुसार इस दिन श्राद्ध करने से दिवंगत हो गई माता एवं अन्य महिलाओं के आशीर्वाद से जातक की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार धन, संपत्ति, सौभाग्य का प्रतीक मातृ नवमी श्राद्ध के दिन घर की पुत्र वधुओं को उपवास भी रखना चाहिए।।
ऐसा इसलिए क्योंकि इस श्राद्ध को सौभाग्यवती श्राद्ध भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार नवमी का श्राद्ध करने पर श्राद्धकर्ता को धन, संपत्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है। साथ ही घर की महिलाओं का सौभाग्य सदा बना रहता है। इस दिन श्राद्ध आदि के अलावा किसी जरूरतमंद गरीबों को या सतपथ ब्राह्मणों को भोजन करवाना भी लाभदायक माना जाता है। इस दिन माताओं के श्राद्ध ऐसे करने का विधान है।।
सर्वप्रथम सुबह नित्यकर्म से निवृत्त होकर घर की दक्षिण दिशा में हरा वस्त्र बिछाएं। इसके बाद सभी पूर्वज पित्रों के चित्र (फोटो) या प्रतीक रूप में एक सुपारी हरे वस्त्र पर स्थापित कर दें। अब पित्रों के निमित्त, तिल के तेल का दीपक जलाएं। सुगन्धित धूप के साथ तिल के तेल का दीपक जलाएं। जल में मिश्री और तिल मिलाकर तर्पण भी करें। फिर परिवार की पितृ माताओं का विशेष श्राद्ध करें। उनके समक्ष एक आटे का बड़ा दीपक भी जलाएं। साथ ही पितरों की फोटो पर गोरोचन और तुलसी पत्र समर्पित करें।।
अब श्राद्धकर्ता यानि जो श्राद्ध करने वाले जातक कुशासन पर बैठकर भगवद् गीता के नवें अध्याय का पाठ करें। पाठ करने के बाद गरीबों या ब्राह्मणों को लौकी की खीर, पालक, मूंगदाल, पूरी, हरे फल, लौंग-इलायची तथा मिश्री के साथ भोजन दें। संभव हो तो भोजन के बाद अपने सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र एवं धन-दक्षिणा आदि देकर उनको विदा करें।।
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