अशून्यशयन २ व्रत है।। Ashunya Shayan Vrat.
आज द्वितीया तिथि को अशून्यशयन २ व्रत है। यह एक वैदिक-परंपरा वाला व्रत है, जो चातुर्मास के दौरान प्रत्येक कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दांपत्य सुख, गृहस्थ जीवन की स्थिरता, जीवनसाथी की दीर्घायु और वैवाहिक संबंधों में मधुरता प्राप्त करना माना गया है। “अशून्य” का अर्थ है “रिक्त न होना” और “शयन” का अर्थ है “शय्या” या “बिस्तर पर साथ रहना”। इसलिए अशून्यशयन का भाव यह है कि जीवनसाथी का साथ बना रहे, दांपत्य जीवन में दूरी न आए और गृहस्थ जीवन में अकेलापन न हो।।
इस व्रत को करने से पति-पत्नी के रिश्ते मजबूत, वैवाहिक जीवन से कलह दूर है और घर में शांति बना रहता है ऐसा यह व्रत माना जाता है। लोक-मान्यता के अनुसार इससे दांपत्य सुख बढ़ता है। वैवाहिक जीवन में प्रेम बना रहता है और आर्थिक-सौभाग्य की भी प्राप्ति होती है। आसान शब्दों में कहें तो अशून्यशयन द्वितीया व्रत वह व्रत है जिसे दांपत्य जीवन की रक्षा और संबंधों में स्थिरता के लिए किया जाता है। यह ऐसा व्रत है जिसमें भगवान विष्णु और लक्ष्मी की उपासना के माध्यम से “साथ न छूटे” और “घर सूना न हो” जैसी भावना को साधा जाता है।।
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