सूर्य दशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा का शुभाशुभ फल।।

Swami Ji Maharaj
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सूर्य दशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा का शुभाशुभ फल।। Surya Dasha Me Sabhi Grahon Ki Antardasha Ka Fal.

सूर्य दशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा का शुभाशुभ फल।। Surya Dasha Me Sabhi Grahon Ki Antardasha Ka Fal.


सूर्य महादशा का परिचय।। Introduction to Surya Mahadasha.


मित्रों, वैदिक ज्योतिष में विंशोत्तरी दशा पद्धति के अनुसार सूर्य की महादशा कुल छः वर्षों की मानी गई है। सूर्य आत्मा, पिता, राजसत्ता, आत्मबल, मान-सम्मान तथा नेतृत्व क्षमता का प्रमुख कारक ग्रह माना जाता है। जब भी किसी जातक की कुंडली में सूर्य की महादशा प्रारंभ होती है, तो उसके जीवन में आत्मविश्वास, अधिकार तथा प्रतिष्ठा से जुड़े विषय अत्यंत प्रधान हो जाते हैं। यही कारण है कि सूर्य की महादशा को राजयोग तुल्य भी माना गया है।।


परन्तु किसी भी महादशा का संपूर्ण फल केवल महादशा के स्वामी ग्रह पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि उस महादशा के अंतर्गत आने वाली प्रत्येक ग्रह की अंतर्दशा भी अपना विशिष्ट प्रभाव दिखाती है। सूर्य की महादशा में क्रमशः सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु तथा शुक्र की अंतर्दशायें बारी-बारी से आती है। इन नौ अंतर्दशाओं में से प्रत्येक अपने स्वभाव, मित्रता-शत्रुता तथा जन्मकुंडली में स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न फल प्रदान करती है।।


सामान्यतः सूर्य की महादशा चंद्रमा, मंगल तथा गुरु जैसे मित्र ग्रहों की अंतर्दशा में अधिक शुभ फलदायी सिद्ध होती है। जबकि शनि, राहु तथा केतु जैसे ग्रहों की अंतर्दशा में जातक को अनेक प्रकार के संघर्षों तथा बाधाओं का सामना भी करना पड़ता है। वैसे वास्तविक फल का निर्णय तो सदैव संपूर्ण जन्मकुंडली, ग्रहों की स्थिति तथा गोचर के आधार पर ही किया जाता है।।


सूर्य महादशा में सूर्य की अंतर्दशा।। Surya Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, सूर्य की महादशा के आरंभ में ही सूर्य की अंतर्दशा आती है। जो लगभग छः माह तक रहती है। यदि जन्मकुंडली में सूर्य शुभ भाव में स्थित होकर बलवान हो तथा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो इस अंतर्दशा में जातक को राजकीय सम्मान, पद-प्रतिष्ठा में वृद्धि, आत्मबल में उन्नति तथा सरकारी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। नौकरी में पदोन्नति के भी प्रबल योग इसी अवधि में बनते हैं।।


इसके विपरीत यदि सूर्य पीड़ित हो, नीचस्थ हो अथवा पापग्रहों से युक्त हो, तो इस अंतर्दशा में पिता से मतभेद, नेत्र संबंधी विकार, हृदय रोग तथा अहंकार के कारण संबंधों में कटुता उत्पन्न होती है। सरकार अथवा उच्चाधिकारियों से भी अनावश्यक विवाद की संभावना बनी रहती है। जातक को इस समय विनम्रता तथा संयम बनाए रखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।।


सूर्य महादशा में चंद्र की अंतर्दशा।। Chandra Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, सूर्य के पश्चात चंद्रमा की अंतर्दशा आती है, जो लगभग दस माह तक रहती है। सूर्य तथा चंद्रमा दोनों ही परस्पर मित्र ग्रह माने गए हैं। अतः यह अंतर्दशा सामान्यतः शुभ फलदायी सिद्ध होती है। इस अवधि में जातक को बंधु-बांधवों तथा मित्रों के सहयोग से धन-लाभ, मान-सम्मान में वृद्धि तथा माता के साथ मधुर संबंधों का सुख प्राप्त होता है।।


चंद्रमा मन तथा भावनाओं का भी कारक ग्रह माना जाता है। इसलिए इस अंतर्दशा में जातक की मानसिक स्थिति भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि चंद्रमा कुंडली में क्षीण अथवा पीड़ित हो, तो मानसिक अस्थिरता, चंचलता तथा माता के स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएँ भी होती हैं। ऐसे में मन को शांत तथा संतुलित बनाए रखना विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होता है।।


सूर्य महादशा में मंगल की अंतर्दशा।। Mangal Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, चंद्रमा के पश्चात मंगल की अंतर्दशा आती है, जो लगभग सात माह तक रहती है। सूर्य और मंगल दोनों ही परस्पर घनिष्ठ मित्र ग्रह हैं। अतः यह अंतर्दशा प्रायः शुभ मानी जाती है। इस अवधि में जातक को भूमि, भवन अथवा स्थावर संपत्ति की प्राप्ति, पराक्रम में वृद्धि तथा शत्रुओं पर विजय जैसे उत्तम फल प्राप्त होते हैं। स्वर्ण अथवा रत्न एवं धन का लाभ भी इसी अंतर्दशा में होता है।।


परन्तु मंगल एक उग्र स्वभाव का ग्रह भी है। इसलिए यदि यह कुंडली में पीड़ित हो, तो इस अंतर्दशा में जातक को क्रोध, दुर्घटना का भय, रक्त संबंधी विकार तथा भाई-बंधुओं से विवाद की स्थिति भी उत्पन्न होती है। पित्त दोष से जुड़े रोगों की वृद्धि भी इसी समय अधिक देखी जाती है। अतः स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना आवश्यक एवं ग्रह से सम्बंधित ज्योतिषीय उपाय करना श्रेयस्कर होता है।।


सूर्य महादशा में राहु की अंतर्दशा।। Rahu Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, मंगल के पश्चात राहु की अंतर्दशा आती है, जो लगभग अठारह माह की लंबी अवधि तक रहती है। सूर्य तथा राहु का संबंध शास्त्रों में शत्रुतापूर्ण माना गया है, अतः यह अंतर्दशा सामान्यतः जातक के लिए संघर्षपूर्ण सिद्ध होती है। इस अवधि में मान-सम्मान में कमी, सरकारी कार्यों में विलंब तथा अनावश्यक भय एवं आशंका जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।।


यदि राहु जन्मकुंडली में शुभ भाव में स्थित होकर बलवान हो, तो यही अंतर्दशा अप्रत्याशित धन-लाभ, विदेश से जुड़े कार्यों में सफलता तथा अचानक भाग्योदय भी कराती है। परन्तु सामान्यतः इस अवधि में जातक को धैर्य, संयम तथा राहु से संबंधित ज्योतिषीय उपाय अपनाने की सलाह दी जाती है। ताकि अशुभ प्रभावों को न्यूनतम किया जा सके।।


सूर्य महादशा में गुरु की अंतर्दशा।। Guru Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, राहु के पश्चात गुरु अर्थात बृहस्पति की अंतर्दशा आती है, जो लगभग बारह माह तक रहती है। सूर्य तथा गुरु दोनों ही परस्पर मित्र ग्रह माने गए हैं। अतः यह अंतर्दशा अत्यंत शुभ फलदायी सिद्ध होती है। इस अवधि में जातक को धन-लाभ, संतान सुख, विद्या-बुद्धि में वृद्धि तथा गुरुजनों के आशीर्वाद जैसे उत्तम फल प्राप्त होते हैं।।


गुरु ज्ञान, धर्म तथा भाग्य का प्रमुख कारक ग्रह माना गया है। इसलिए इस अंतर्दशा में जातक का धार्मिक कार्यों में तथा उच्च शिक्षा के प्रति भी विशेष झुकाव देखा जाता है। यदि गुरु कुंडली में पीड़ित हो, तो संतान संबंधी विलंब अथवा गुरुजनों से मतभेद जैसी बाधाएँ भी उत्पन्न होती हैं। परंतु समग्र रूप से यह अंतर्दशा जातक के लिए लाभकारी ही मानी जाती है।।


सूर्य महादशा में शनि की अंतर्दशा।। Shani Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, गुरु के पश्चात शनि की अंतर्दशा आती है, जो लगभग उन्नीस माह की सबसे लंबी अवधि तक रहती है। सूर्य तथा शनि पिता-पुत्र होते हुए भी परस्पर शत्रु ग्रह माने गए हैं। अतः यह अंतर्दशा प्रायः कष्टकारी सिद्ध होती है। इस अवधि में जातक को सरकार की ओर से भय, शत्रुओं से पराजय, दीनता तथा अनेक प्रकार के मानसिक तनावों का सामना करना पड़ता है।।


कार्यक्षेत्र में भी विलंब, परिश्रम के अनुपात में अपेक्षित सफलता न मिलना तथा स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें भी इसी अंतर्दशा की सामान्य विशेषताएँ मानी जाती हैं। ऐसे में जातक को धैर्य, अनुशासन तथा सेवा-भाव बनाए रखते हुए शनिदेव की उपासना करनी चाहिए। जिससे इस दीर्घ अवधि के अशुभ प्रभावों को किसी एक सीमा तक नियंत्रित किया जाये।।


सूर्य महादशा में बुध की अंतर्दशा।। Budh Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, शनि के पश्चात बुध की अंतर्दशा आती है, जो लगभग सत्रह माह तक रहती है। सूर्य के अत्यंत निकट रहने के कारण बुध प्रायः अस्त अवस्था में रहता है। अतः इस अंतर्दशा का फल मिश्रित स्वरूप का माना जाता है। इस अवधि में जातक को वात-कफ तथा रक्त संबंधित रोगों की अधिकता, तथा वाणी में विकार के कारण संबंधों में कटुता जैसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न होती हैं।।


यदि बुध जन्मकुंडली में शुभ भाव में स्थित होकर शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो यही अंतर्दशा बौद्धिक कार्यों में सफलता, व्यापार में लाभ तथा वाणी में प्रभाविता भी प्रदान कर देती है। लेखन, शिक्षा अथवा संचार से जुड़े क्षेत्रों में इस अवधि में उन्नति की प्रबल संभावना होती है। बशर्ते बुध की स्थिति कुंडली में सुदृढ़ हो।।


सूर्य महादशा में केतु की अंतर्दशा।। Ketu Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, बुध के पश्चात केतु की अंतर्दशा आती है, जो लगभग छः माह तक रहती है। राहु के समान ही केतु का संबंध भी सूर्य के साथ शत्रुतापूर्ण माना गया है। अतः यह अंतर्दशा भी सामान्यतः शुभ नहीं मानी जाती। इस अवधि में जातक को मानसिक अशांति, अकारण भय, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ तथा कार्यों में अनावश्यक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।।


केतु मोक्ष तथा आध्यात्म का भी कारक ग्रह है। इसलिए इस अंतर्दशा में जातक का रुझान स्वाभाविक रूप से धार्मिक अनुष्ठानों, तीर्थयात्रा तथा आत्मचिंतन की ओर भी बढ़ जाता है। यदि केतु कुंडली में शुभ भाव में स्थित हो, तो यह अंतर्दशा आध्यात्मिक उन्नति तथा गूढ़ विषयों के ज्ञान में भी वृद्धि कराती है।।


सूर्य महादशा में शुक्र की अंतर्दशा।। Shukra Antardasha in Surya Mahadasha.


मित्रों, केतु के पश्चात शुक्र की अंतर्दशा आती है, जो लगभग बीस माह की अवधि तक रहती है। सूर्य तथा शुक्र दोनों ही परस्पर शत्रु ग्रह माने गए हैं। अतः यह अंतर्दशा भी अनेक बार जातक के लिए चुनौतीपूर्ण ही सिद्ध होती है। इस अवधि में दांपत्य जीवन में मतभेद, भोग-विलास की अत्यधिक प्रवृत्ति तथा नेत्र संबंधी विकार जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती देखि गयी है।।


परन्तु यदि शुक्र जन्मकुंडली में शुभ भाव में स्थित होकर बलवान हो, तो यही अंतर्दशा वैभव, सुख-सुविधा तथा कला के क्षेत्र में सफलता भी प्रदान करती है। यह अंतर्दशा सूर्य महादशा की अंतिम अंतर्दशा होती है। अतः इसके पश्चात जातक की चंद्र महादशा प्रारंभ हो जाती है और जीवन का एक नया दशा-चक्र आरंभ होता है।।


सूर्य महादशा को शुभ बनाने के वैदिक उपाय।। Vedic Remedies to Strengthen Surya Mahadasha.


मित्रों, सूर्य की महादशा तथा उसके अंतर्गत आने वाली अंतर्दशाओं को शुभ एवं संतुलित बनाए रखने के लिए प्रतिदिन सूर्योदय के समय ताम्र पात्र से जल में लाल पुष्प तथा रोली मिलाकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। साथ ही आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ तथा "ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः" मंत्र का जप करना भी अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।।


रविवार के दिन गुड़, गेहूं तथा तांबे की वस्तुओं का दान करना चाहिए। पिता तथा वरिष्ठजनों का सम्मान करना, तथा आवश्यकता पड़ने पर योग्य ज्योतिषी के परामर्श से माणिक्य रत्न धारण करना भी सूर्य को बलवान बनाकर महादशा के शुभ फलों में वृद्धि करने में सहायक सिद्ध होता है।।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)


प्रश्न 1. सूर्य की महादशा कितने वर्ष की होती है।। How many years does Surya Mahadasha last.


उत्तर:- विंशोत्तरी दशा पद्धति के अनुसार सूर्य की महादशा कुल छः वर्षों की मानी गई है।।


प्रश्न 2. सूर्य महादशा में सबसे शुभ अंतर्दशा कौन-सी मानी जाती है।। Which antardasha is considered most auspicious in Surya Mahadasha.


उत्तर:- सूर्य महादशा में चंद्र, मंगल तथा गुरु की अंतर्दशा मित्र ग्रह होने के कारण सामान्यतः सर्वाधिक शुभ फलदायी मानी जाती है।।


प्रश्न 3. सूर्य महादशा में कौन-सी अंतर्दशा कष्टकारी सिद्ध हो सकती है।। Which antardasha can prove troublesome in Surya Mahadasha.


उत्तर:- सूर्य महादशा में शनि, राहु, केतु तथा शुक्र की अंतर्दशा शत्रु ग्रह होने के कारण सामान्यतः अधिक संघर्षपूर्ण मानी जाती है।।


प्रश्न 4. सूर्य महादशा के अशुभ फलों को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय क्या है।। What is the most effective remedy to reduce the inauspicious effects of Surya Mahadasha.


उत्तर:- प्रतिदिन सूर्य को जल का अर्घ्य देना, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना तथा रविवार के दिन सूर्य से सम्बंधित दान करना ज्योतिषीय दृष्टिकोण से सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।।


प्रश्न 5. सूर्य महादशा के पश्चात कौन-सी महादशा आरंभ होती है।। Which mahadasha begins after Surya Mahadasha.


उत्तर:- विंशोत्तरी दशा क्रम के अनुसार सूर्य की महादशा के पश्चात चंद्र की महादशा आरंभ होती है।।


लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.


मित्रों, सूर्य की महादशा में अन्य सभी ग्रहों की अंतर्दशा अपने-अपने स्वभाव, मित्रता-शत्रुता तथा जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न फल प्रदान करती है। चंद्र, मंगल तथा गुरु जैसे मित्र ग्रहों की अंतर्दशा सामान्यतः मान-सम्मान, धन-लाभ तथा भाग्योदय जैसे शुभ फल देती है। वहीं शनि, राहु, केतु तथा शुक्र जैसे ग्रहों की अंतर्दशा में जातक को संघर्ष, स्वास्थ्य संबंधी कष्ट तथा मानसिक तनाव का सामना भी करना पड़ता है।।


वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य की उपासना, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ तथा नियमित सूर्य को अर्घ्य देना इन समस्त अंतर्दशाओं के अशुभ प्रभावों को नियंत्रित करने में विशेष रूप से सहायक सिद्ध होता है। और यहाँ मैं यही कहूँगा कि जो जातक धैर्य, अनुशासन तथा आत्मबल के साथ इस महादशा को जीता है, उसी को सूर्य की महादशा का सर्वाधिक शुभ फल प्राप्त होता है।।


परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि किसी भी विशेष उपाय अथवा निर्णायक निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले किसी अनुभवी, योग्य एवं विद्वान ज्योतिषी से संपूर्ण जन्मकुंडली का विश्लेषण विधिपूर्वक अवश्य करवाना चाहिए। ताकि सही एवं व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। सूर्य की महादशा में अन्य सभी ग्रहों की अंतर्दशा जातक के जीवन में मान-सम्मान, धन, स्वास्थ्य तथा भाग्य से जुड़े अनेक परिवर्तन लाती है।।

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