मुख्य द्वार के लिए शुभ चिन्हों का चयन कैसे करें?।। Auspicious Main Door Symbols.
लेख का परिचय।। Introduction.
मित्रों, त्योहार हो या ना हो, बहुत से घरों के मुख्य द्वार पर साल भर एक तोरण लटका ही रहता है। और दोनों ओर स्वास्तिक अथवा शुभ-लाभ बना हुआ मिलता है। लोग सोचते हैं यह बस परंपरा है, दिखावे के लिए है। बड़े-बुज़ुर्गों की चली आ रही रीत है। जिसे निभाना भर ज़रूरी समझा जाता है। पर वास्तु शास्त्र इसे बहुत गंभीरता से लेता है। और इसके पीछे एक सुनियोजित ऊर्जा-विज्ञान छिपा हुआ मानता है।।
द्वार वह जगह है जहाँ से ऊर्जा घर में दाखिल होती है। और वहाँ लगा हर चिन्ह, हर रंग, उस ऊर्जा को दिशा देने का काम करता है। यही कारण है कि वास्तु में द्वार को घर का मुख माना गया है। और मुख की शोभा तथा शुद्धता पूरे घर के वातावरण को प्रभावित करती है। तो चलिए आज विस्तार से जानते हैं कि द्वार के दोनों ओर सही शुभ चिन्ह और सही तोरण कैसे चुनें, तथा इनसे जुड़े छोटे-छोटे नियम कौन से हैं।।
मित्रों, प्राचीन काल से ही भारतीय स्थापत्य परंपरा में द्वार को अत्यंत पवित्र स्थान माना गया है। क्योंकि यहीं से घर के भीतर और बाहर की ऊर्जाओं का आदान-प्रदान होता है। जब हम द्वार पर शुभ चिन्ह अथवा तोरण सजाते हैं। तब वास्तव में हम उस स्थान को सकारात्मकता से भर रहे होते हैं। ताकि बाहर की नकारात्मक शक्तियाँ भीतर घर में प्रवेश ना कर सकें। यह प्रक्रिया केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी घर में रहने वालों को सुरक्षा का एहसास दिलाती है।।
जब सुबह-सुबह घर से निकलते समय व्यक्ति की नज़र द्वार पर बने शुभ चिन्हों पर पड़ती है, तो मन में एक सकारात्मक भाव जागृत होता है। जो पूरे दिन के कार्यों में उत्साह भरने का काम करता है। इसी तरह शाम को घर लौटते समय भी यही चिन्ह मन को शांति तथा संतोष का अनुभव कराते हैं। इसीलिए वास्तु शास्त्र में इन्हें केवल सजावट नहीं, बल्कि एक सजीव ऊर्जा-स्रोत के रूप में देखा गया है। आज के आधुनिक युग में भी जब घरों की बनावट बदल गई है। फ्लैट संस्कृति बढ़ गई है, तब भी द्वार से जुड़े यह वास्तु सिद्धांत उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं।।
चाहे बड़ा बंगला हो अथवा छोटा फ्लैट, मुख्य द्वार हर घर में एक ही उद्देश्य पूरा करता है। वह है ऊर्जा का प्रवेश-बिंदु। इसलिए दिशा चाहे जो भी हो, आकार चाहे जितना भी छोटा या बड़ा हो, द्वार पर सही शुभ चिन्ह तथा तोरण लगाने के नियम बदलते नहीं। बल्कि आज के तनावपूर्ण जीवन में जहाँ लोग बाहर से थके-हारे घर लौटते हैं, वहाँ द्वार की यह सकारात्मक सजावट और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इस लेख में हम विस्तार से हर पहलू को समझेंगे। ताकि आप अपने घर के द्वार को सही ढंग से सजा सकें और उसकी संपूर्ण शुभता का लाभ उठा सकें।।
द्वार पर कौन सा शुभ चिन्ह लगाना चाहिए।। Which Auspicious Symbol Should Be Placed On The Door.
मित्रों, वास्तु शास्त्र में मुख्य द्वार के दोनों ओर स्वास्तिक, ॐ, शुभ-लाभ, गणेश-लक्ष्मी जी के पद-चिन्ह, कलश अथवा श्रीफल जैसे प्रतीकों को लगाना अत्यंत शुभ माना गया है। इनमें भी सबसे अधिक प्रचलित तथा प्रभावी संयोजन है, एक ओर शुभ और दूसरी ओर लाभ लिखना। साथ ही बीच में या ऊपर स्वास्तिक अथवा ॐ बनाना। यह प्रतीक घर में सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि तथा नकारात्मकता से सुरक्षा का काम करते हैं।।
लक्ष्मी जी के पद-चिन्ह द्वार से घर के भीतर की ओर बनाए जाते हैं। ताकि यह दर्शाया जा सके कि माँ लक्ष्मी घर में प्रवेश कर रही हैं। बाहर नहीं जा रहीं। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि दिशा उल्टी होने पर यह प्रतीक अपना अर्थ ही खो देता है। इसलिए पद-चिन्ह बनवाते समय अनुभवी व्यक्ति अथवा किसी विद्वान ब्राह्मण या किसी विशिष्ट पंडित की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।।
मित्रों, गणेश जी की मूर्ति अथवा चित्र द्वार के ऊपर लगाना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। क्योंकि गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा गया है। जो प्रत्येक बाधा को दूर करने वाले देवता हैं। कई घरों में द्वार के दोनों ओर छोटे-छोटे गणेश जी के चित्र लगाए जाते हैं। जबकि कुछ स्थानों पर एक बड़ा गणेश जी का चित्र द्वार के ठीक ऊपर, चौखट पर स्थापित किया जाता है। इसके साथ ही ॐ का चिन्ह भी अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।।
क्योंकि यह "ॐ" ब्रह्मांड की मूल ध्वनि का प्रतीक है। जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने की क्षमता रखता है। कुछ घरों में स्वास्तिक और ॐ दोनों को एक साथ, एक ही रेखा में बनाया जाता है। ताकि दोनों प्रतीकों का संयुक्त प्रभाव प्राप्त हो सके। यह संयोजन विशेष रूप से उन घरों के लिए अनुशंसित है। जहाँ पारिवारिक कलह अथवा आर्थिक अस्थिरता की समस्या बनी रहती है। इस प्रकार के प्रतीक धीरे-धीरे घर के वातावरण में स्थिरता तथा सामंजस्य लाने में सहायक सिद्ध होते हैं।।
मित्रों, कुछ परिवारों में द्वार के दोनों ओर कलश अथवा श्रीफल यानी नारियल रखने की भी परंपरा है। जो समृद्धि तथा पूर्णता का प्रतीक भी माना जाता है। कलश को जल अथवा अनाज से भरकर रखा जाता है। तथा उसके ऊपर नारियल स्थापित किया जाता है। जिसे देवी-देवताओं के आह्वान का प्रतीक माना गया है। यह परंपरा विशेष रूप से किसी शुभ अवसर, गृह-प्रवेश अथवा त्योहार के समय अपनाई जाती है।।
परंतु कुछ परिवार इसे स्थायी रूप से भी बनाए रखते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ स्थानों पर द्वार के दोनों ओर छोटी घंटियाँ अथवा विंड-चाइम भी लटकाई जाती हैं। ताकि हवा के प्रवाह से उत्पन्न ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाए। यह सभी प्रतीक एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। और इन्हें आवश्यकतानुसार संयोजित रूप से भी उपयोग किया जाता है। महत्वपूर्ण यह है कि जो भी प्रतीक चुना जाए, उसे श्रद्धा तथा नियमितता के साथ बनाए रखा जाए। तभी उसका पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।।
स्वास्तिक का दिशा-अनुसार सही रंग।। The Correct Color Of Swastik According To Direction.
मित्रों, यहाँ एक ज़रूरी बात समझ लीजिए। स्वास्तिक बनाना ही काफी नहीं, उसका रंग भी द्वार की दिशा के अनुरूप होना चाहिए। अगर मुख्य द्वार उत्तर दिशा में हो, तो नीले रंग का स्वास्तिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशा जल तत्व तथा कुबेर से जुड़ी हुई होती है। अगर द्वार पूर्व दिशा में हो, तो हरा अथवा हल्का भूरा रंग उपयुक्त रहता है। क्योंकि पूर्व दिशा सूर्य देव तथा वायु तत्व से संबंधित मानी जाती है।।
अगर द्वार उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण में हो, तो हल्का पीला अथवा क्रीम रंग का स्वास्तिक सबसे शुभ बताया गया है। क्योंकि यह कोण जल तथा आकाश तत्व दोनों का संगम माना जाता है। दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य कोण के द्वार पर पीला अथवा क्रीम रंग का स्वास्तिक उपयुक्त रहता है। जबकि पश्चिम दिशा के द्वार पर आसमानी नीला रंग शुभ माना जाता है। इन सभी नियमों के पीछे यह सिद्धांत काम करता है कि हर दिशा किसी ना किसी पंचतत्व से जुड़ी होती है। और उस तत्व से मेल खाता रंग ही अधिकतम शुभता प्रदान करता है।।
मित्रों, दक्षिण दिशा तथा आग्नेय कोण के द्वार पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। क्योंकि यह दिशाएं अग्नि तत्व तथा यम देवता से जुड़ी मानी जाती हैं। ऐसे द्वारों पर हल्का गुलाबी अथवा हल्का लाल रंग का स्वास्तिक बनाना उपयुक्त माना गया है। क्योंकि यह रंग अग्नि तत्व को संतुलित करने का कार्य करता है। वायव्य कोण अर्थात उत्तर-पश्चिम दिशा के द्वार पर सफेद अथवा हल्का धूसर रंग का स्वास्तिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशा वायु तत्व से संबंधित होती है।।
यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि गहरे तथा भड़कीले रंगों का प्रयोग स्वास्तिक बनाने में नहीं करना चाहिए। चाहे दिशा कोई भी हो। हल्के तथा सौम्य रंग ही वास्तु की दृष्टि से अधिक प्रभावशाली तथा शांतिदायक माने गए हैं। इसी कारण परंपरागत रूप से सिंदूर, हल्दी अथवा गेरू रंग जैसे प्राकृतिक रंगों का उपयोग स्वास्तिक बनाने में किया जाता रहा है। जो इन नियमों के अनुरूप भी बैठते हैं।।
मित्रों, यहाँ सिद्धांत वही पुराना है, जो रंग उस दिशा के तत्व से मेल खाए, वही रंग स्वास्तिक तथा अन्य शुभ चिन्हों के लिए भी सही माना जाएगा। दिशा बदलते ही रंग भी बदल जाना चाहिए। एक ही रंग हर दिशा पर थोप देना उचित नहीं। कई बार लोग बाज़ार से तैयार स्वास्तिक स्टिकर खरीद लेते हैं। बिना यह देखे कि उनका रंग उनके द्वार की दिशा से मेल खाता है अथवा नहीं।।
जिससे वांछित लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। इसलिए सबसे पहले अपने घर के मुख्य द्वार की सही दिशा कंपास अथवा वास्तु विशेषज्ञ की सहायता से ज्ञात कर लेनी चाहिए। तत्पश्चात ही उसके अनुसार ही रंग का चयन करना चाहिए। यदि किसी कारणवश दिशा स्पष्ट रूप से ज्ञात ना हो सके। तो पीले अथवा सिंदूरी रंग का स्वास्तिक एक सामान्य तथा सुरक्षित विकल्प माना जाता है। क्योंकि यह रंग लगभग हर दिशा में शुभता प्रदान करने में सक्षम माना गया है।।
तोरण किन पत्तों तथा किन फूलों का होना चाहिए।। Which Leaves And Flowers Should The Toran Be Made Of.
मित्रों, तोरण अर्थात बंदनवार परंपरागत रूप से आम के पत्तों तथा अशोक के पत्तों से बनाया जाता है। यह दोनों ही पत्ते शुभता तथा नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखने के प्रतीक माने जाते हैं। इनके साथ पीले रंग के गेंदे के फूलों का प्रयोग विशेष रूप से शुभ बताया गया है। क्योंकि पीला रंग सौभाग्य तथा समृद्धि का प्रतीक माना गया है। कहीं-कहीं गुलाब अथवा गुड़हल के फूल भी तोरण में सम्मिलित किए जाते हैं।।
परंतु आम-अशोक के पत्तों के साथ पीले गेंदे का संयोजन सर्वाधिक पारंपरिक तथा प्रभावी माना जाता है। आम के पत्तों को विशेष रूप से इसलिए महत्व दिया जाता है क्योंकि इन्हें भगवान विष्णु से जुड़ा माना जाता है। तथा यह समृद्धि एवं संतान-सुख के प्रतीक भी माने जाते हैं। अशोक के पत्तों का अपना अलग महत्व है। क्योंकि इनका नाम ही 'शोक-रहित' अर्थात दुख से मुक्त होने का संकेत देता है। यही कारण है कि इन पत्तों को घर के द्वार पर लगाने से परिवार में दुख-दर्द तथा नकारात्मक घटनाओं की संभावना कम हो जाती है। ऐसा वास्तु शास्त्र में माना गया है।।
कुछ क्षेत्रों में तोरण बनाते समय आम-अशोक के साथ-साथ नीम के पत्तों को भी सम्मिलित किया जाता है। क्योंकि नीम को औषधीय गुणों के साथ-साथ नकारात्मक ऊर्जा तथा बुरी नज़र से बचाने वाला भी माना जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ परिवार तुलसी के छोटे पत्तों की माला भी तोरण में जोड़ते हैं। जिससे तोरण की पवित्रता और अधिक बढ़ जाती है। यह सभी संयोजन क्षेत्रीय परंपराओं तथा पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार थोड़े-बहुत भिन्न हो सकते हैं। परंतु मूल भावना सदैव एक ही रहती है, वह है शुभता तथा सुरक्षा का आह्वान।।
मित्रों, फूलों के चयन में भी सावधानी बरतनी चाहिए। क्योंकि हर फूल का अपना ऊर्जात्मक प्रभाव माना गया है। पीले गेंदे के फूल के अतिरिक्त कमल का फूल भी अत्यंत शुभ माना जाता है। क्योंकि यह माता लक्ष्मी का प्रिय पुष्प है। परंतु इसका उपयोग तोरण में कम तथा पूजा में अधिक किया जाता है। सफेद फूल जैसे मोगरा अथवा चमेली को शांति तथा पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।।
इन्हें भी कभी-कभी तोरण में गेंदे के साथ मिलाकर प्रयोग किया जाता है। मुरझाए हुए अथवा काले पड़ चुके फूलों का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए। चाहे वह किसी भी प्रकार के हों। क्योंकि यह नकारात्मक संकेत माने जाते हैं। ताज़े तथा जीवंत रंगों वाले फूल ही तोरण की शोभा तथा शुभता दोनों को बनाए रखते हैं। इसलिए इन्हें समय-समय पर बदलते रहना भी अत्यंत आवश्यक माना गया है।।
तोरण का रंग किस आधार पर चुनें।। On What Basis Should The Toran Color Be Chosen.
मित्रों, तोरण में इस्तेमाल होने वाले धागे, कपड़े अथवा मोतियों का रंग भी द्वार की दिशा को ध्यान में रखकर चुना जा सकता है। पूर्व तथा ईशान दिशा के द्वार पर हल्का पीला अथवा सफेद तोरण उपयुक्त रहता है। क्योंकि यह दिशाएं ज्ञान तथा सकारात्मकता से जुड़ी मानी जाती हैं। उत्तर दिशा के द्वार पर हरा अथवा हल्का नीला तोरण शुभ माना जाता है। क्योंकि यह रंग बुध ग्रह तथा जल तत्व दोनों के अनुकूल होता हैं।।
दक्षिण तथा आग्नेय दिशा के द्वार पर लाल अथवा नारंगी रंग के धागों वाला तोरण बेहतर रहता है। जबकि पश्चिम तथा वायव्य दिशा के द्वार पर सफेद अथवा हल्के रंग का तोरण उपयुक्त समझा जाता है। नैऋत्य कोण के द्वार पर पीले अथवा भूरे रंग के तोरण को प्राथमिकता देनी चाहिए। क्योंकि यह कोण पृथ्वी तत्व से जुड़ा हुआ माना जाता है।।
मित्रों, तोरण बनाने में प्रयुक्त सामग्री का भी अपना महत्व होता है। कुछ परिवार ऊन अथवा रेशम के धागों से तोरण तैयार करते हैं। जबकि कुछ परिवार प्राकृतिक रेशों जैसे जूट अथवा सूती धागे को प्राथमिकता देते हैं। वास्तु की दृष्टि से प्राकृतिक तथा जैविक सामग्री से बना तोरण अधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह पृथ्वी से जुड़ी ऊर्जा को बेहतर ढंग से आकर्षित करता है।।
प्लास्टिक अथवा कृत्रिम सामग्री से बने तोरण, भले ही देखने में आकर्षक लगें। परंतु ऊर्जात्मक दृष्टि से उतने प्रभावशाली नहीं माने जाते। इसलिए जहाँ तक संभव हो, तोरण बनाने अथवा खरीदने में प्राकृतिक पत्तों, फूलों तथा धागों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। घर में स्वयं तोरण बनाना और भी अधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि इसमें बनाने वाले की सकारात्मक भावना तथा श्रद्धा भी सम्मिलित हो जाती है।।
मित्रों, कुछ लोग तोरण के साथ-साथ छोटी-छोटी घंटियाँ अथवा मोर पंख भी जोड़ देते हैं। जिन्हें अतिरिक्त शुभता का प्रतीक माना जाता है। मोर पंख को भगवान कृष्ण से जुड़ा माना जाता है। तथा इसे सौंदर्य एवं सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी समझा जाता है। घंटियों की मधुर ध्वनि हवा के साथ गूंजती है। जो वातावरण को शुद्ध करने में सहायक मानी जाती है।।
कुछ स्थानों पर तोरण के दोनों छोर पर छोटे-छोटे लाल अथवा पीले रंग के फुंदने भी लगाए जाते हैं। जो देखने में आकर्षक होने के साथ-साथ शुभता का प्रतीक भी माने जाते हैं। इस प्रकार तोरण का रंग तथा उसमें जोड़ी गई सामग्री। सब मिलकर द्वार की समग्र ऊर्जा को प्रभावित करते हैं। इसलिए इनके चयन में सावधानी अवश्य बरतनी चाहिए।।
द्वार के दोनों ओर रखने योग्य अन्य शुभ वस्तुएं।। Other Auspicious Items To Keep On Both Sides Of The Door.
मित्रों, शुभ चिन्ह तथा तोरण के अतिरिक्त द्वार के दोनों ओर तुलसी का पौधा अथवा कोई भी हरा-भरा शुभ पौधा रखना भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। कलश की स्थापना, विशेषकर नारियल सहित पूर्ण कलश, द्वार के एक ओर रखना समृद्धि का भी प्रतीक माना जाता है। द्वार के सामने प्रतिदिन सुंदर रंगोली बनाना भी सकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित करने की प्राचीन परंपरा रही है।।
इन सभी वस्तुओं को हमेशा स्वच्छ तथा सुव्यवस्थित रखना चाहिए। क्योंकि बासी अथवा मुरझाए हुए फूल-पत्ते उलटा नकारात्मक संकेत देते हैं। तुलसी के अतिरिक्त कुछ घरों में द्वार के पास मनी प्लांट अथवा एरिका पाम जैसे पौधे भी लगाये जाते हैं। जिन्हें आर्थिक समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।।
मित्रों, द्वार के दोनों ओर छोटे-छोटे दीपक अथवा दीये रखना भी वास्तु की दृष्टि से अत्यंत शुभ माना गया है। विशेष रूप से संध्या के समय इन्हें प्रज्वलित करना चाहिए। दीपक की लौ को नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने वाली शक्ति माना जाता है। तथा यह घर में सुख-समृद्धि लाने का भी प्रतीक होता है। कुछ परिवार द्वार के पास छोटी घंटी लटकाते हैं। जिसे प्रवेश करते तथा बाहर जाते समय बजाने की परंपरा है।।
ताकि घर की ऊर्जा सदैव जाग्रत तथा सक्रिय बनी रहे। इसके अतिरिक्त द्वार के पास साफ-सुथरी पायदान अथवा चटाई रखना भी आवश्यक माना जाता है। क्योंकि इससे बाहर की धूल-मिट्टी के साथ-साथ नकारात्मक ऊर्जा भी घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाती। यह छोटी-छोटी वस्तुएं देखने में सामान्य लगती हैं। परंतु वास्तु शास्त्र में इनका विशेष स्थान बताया गया है।।
मित्रों, कुछ परिवारों में द्वार के दोनों ओर शंख अथवा छोटी घंटियों वाली झालर भी सजाई जाती है। जिसे सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। शंख की ध्वनि को अत्यंत पवित्र माना गया है। तथा इसे बजाने से वातावरण में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। इसके साथ ही कुछ स्थानों पर द्वार के पास पीतल अथवा तांबे के छोटे-छोटे बर्तन भी सजावट के रूप में रखे जाते हैं।।
जिन्हें धातु-शास्त्र की दृष्टि से भी शुभ माना जाता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि द्वार के आस-पास अव्यवस्था अथवा टूटी-फूटी वस्तुएं बिल्कुल भी नहीं रखनी चाहिए। चाहे वह जूते-चप्पल हों अथवा कोई अन्य सामान। क्योंकि इससे ऊर्जा का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। द्वार का परिसर जितना स्वच्छ, सुव्यवस्थित तथा सजा हुआ होगा, घर में उतनी ही अधिक सकारात्मक उर्जा का संचार होगा।।
ध्यान रखने योग्य कुछ ज़रूरी बातें।। A Few Important Points To Keep In Mind.
मित्रों, तोरण अथवा शुभ चिन्ह को कभी भी टूटा-फूटा, मुरझाया अथवा धूल भरा नहीं रहने देना चाहिए। इन्हें नियमित रूप से बदलते तथा साफ करते रहना चाहिए। विशेषकर तोरण के फूल-पत्ते सूखने पर तुरंत हटा देने चाहिए। इसके साथ ही स्वास्तिक अथवा ॐ को कभी भी उल्टा अथवा टेढ़ा नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि इसे अशुभ माना जाता है।।
सही दिशा, सही रंग तथा नियमित स्वच्छता, यही तीन बातें मिलकर द्वार की शोभा और शुभता दोनों बनाए रखती हैं। इसके अतिरिक्त शुभ चिन्ह बनाते समय मन में शांति तथा सकारात्मक भाव रखना भी आवश्यक माना जाता है। क्योंकि जल्दबाज़ी अथवा नकारात्मक मनोभाव से बनाए गए चिन्ह उतना प्रभावी नहीं माने जाते।।
मित्रों, त्योहारों के अवसर पर विशेष रूप से पुराने तथा फीके पड़ चुके तोरण को नए तोरण से बदल देना चाहिए। चाहे वह अभी टूटा ना हो। दिवाली, नवरात्रि, गुड़ी पड़वा अथवा अन्य किसी भी शुभ अवसर पर घर की साफ-सफाई के साथ-साथ द्वार के चिन्हों तथा तोरण को भी नवीनीकृत करना एक अच्छी परंपरा मानी जाती है।।
इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि द्वार के दोनों ओर बनाए गए शुभ चिन्ह समान आकार तथा समान दूरी पर हों। ताकि दृश्य संतुलन बना रहे। जिसे वास्तु में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। असंतुलित अथवा टेढ़े-मेढ़े ढंग से बनाए गए चिन्ह देखने में भी अच्छे नहीं लगते। तथा ऊर्जात्मक दृष्टि से भी उतने प्रभावशाली नहीं माने जाते। इसलिए इन्हें बनाते समय धैर्य तथा सावधानी अवश्य बरतनी चाहिए।।
मित्रों, यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि द्वार पर लगे शुभ चिन्ह तथा तोरण का प्रभाव तभी पूर्ण रूप से प्राप्त होता है। जब घर के भीतर का वातावरण भी स्वच्छ तथा सुव्यवस्थित हो। केवल बाहरी सजावट पर ध्यान देना तथा भीतर अव्यवस्था बनाए रखना। वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत माना जाता है। इसलिए द्वार की शुभता के साथ-साथ पूरे घर की स्वच्छता तथा व्यवस्था पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए।।
साथ ही यह भी स्मरण रखें कि यह सभी उपाय पूर्ण श्रद्धा तथा सकारात्मक भावना के साथ किए जाने चाहिए। ना कि केवल एक औपचारिकता के रूप में। जब यह उपाय सच्चे मन से तथा नियमितता के साथ किए जाते हैं। तभी इनका वास्तविक और दीर्घकालिक लाभ घर के सदस्यों को प्राप्त होता है।।
निष्कर्ष, छोटे प्रतीक, बड़ा प्रभाव।। Conclusion, Small Symbols With A Big Impact.
मित्रों, तो अब स्पष्ट है कि द्वार के दोनों ओर लगा शुभ चिन्ह और तोरण कोई साधारण सजावट नहीं। बल्कि एक सुनियोजित वास्तु का उपाय है। स्वास्तिक तथा ॐ जैसे प्रतीक, दिशा के अनुरूप उनका सही रंग, और आम-अशोक के पत्तों के साथ पीले गेंदे का तोरण, यह तीनों मिलकर द्वार को सचमुच शुभ द्वार बनाते हैं। छोटी सी बात लगती है, पर यही छोटी-छोटी बातें मिलकर घर की समग्र ऊर्जा तय करती हैं। जब यह सभी तत्व सही ढंग से तथा सही दिशा-ज्ञान के साथ अपनाए जाते हैं। तो घर में सुख, शांति तथा समृद्धि का वातावरण स्वाभाविक रूप से बना रहता है।।
इस पूरे लेख का सार यही है कि द्वार पर की गई हर छोटी-बड़ी सजावट का अपना वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक आधार है। जिसे समझकर अपनाने से घर की ऊर्जा में सकारात्मक परिवर्तन आता है। सही चिन्ह का चयन, दिशा के अनुसार सही रंग, प्राकृतिक तथा ताज़ी सामग्री का प्रयोग, तथा नियमित स्वच्छता, यह सभी मिलकर एक संपूर्ण वास्तु उपाय बनाते हैं। इसे अपनाने के लिए किसी बड़े खर्च अथवा जटिल प्रक्रिया की भी आवश्यकता नहीं होती। बल्कि थोड़ी सी जागरूकता तथा नियमितता ही पर्याप्त है। इसलिए अगली बार जब भी आप अपने घर के द्वार को सजाएं, तो इन सभी बातों का ध्यान अवश्य रखें। ताकि आपका द्वार सही अर्थों में शुभ द्वार बन सके।।
मित्रों, अंत में यह भी कहना चाहेंगे कि वास्तु शास्त्र के यह सिद्धांत सदियों के अनुभव तथा अवलोकन पर आधारित हैं। जिन्हें हमारे पूर्वजों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा है। आधुनिक जीवनशैली में भले ही बहुत कुछ बदल गया हो, परंतु द्वार की शुभता से जुड़े यह मूल सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। जितने पहले थे। इन्हें अपनाकर हम ना केवल अपने घर को सुंदर तथा सुसज्जित बनाते हैं, बल्कि एक सकारात्मक तथा ऊर्जावान वातावरण भी सृजित करते हैं। यही कारण है कि आज भी लाखों घरों में इन परंपराओं को श्रद्धा तथा विश्वास के साथ निभाया जाता है। और आगे भी निभाया जाता रहेगा। आशा है यह विस्तृत जानकारी आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी।।
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