द्वार की दहलीज़ की सही ऊंचाई कितनी होनी चाहिए।।

Swami Ji Maharaj
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द्वार की दहलीज़ की सही ऊंचाई कितनी होनी चाहिए।। Correct Threshold Height As Per Vastu.

द्वार की दहलीज़ की सही ऊंचाई कितनी होनी चाहिए।। Correct Threshold Height As Per Vastu


लेख का परिचय।। Introduction.

मित्रों, ज़रा गौर कीजिए, पुराने ज़माने के घरों में हर दरवाज़े के नीचे एक उभरी हुई लकड़ी की पट्टी ज़रूर होती थी। और घर के बड़े-बुज़ुर्ग उस पर पैर रखने से भी मना करते थे। आज के मॉडर्न फ्लैट्स में यह चीज़ धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। लोग सोचते हैं यह बस पैर अटकने की एक रुकावट है। हटा दो, फ्लैट फ्लोर रखो, स्टाइलिश लगेगा। पर वास्तु शास्त्र कहता है, रुकिए ज़रा, यह पट्टी उतनी मामूली नहीं जितनी दिखती है। यह दहलीज़ है, और इसकी ऊंचाई एक सोची-समझी वास्तु-गणना का हिस्सा है।।

दहलीज़ आखिर होती क्यों है।। Why Does A Threshold Exist At All.

मित्रों, वास्तु शास्त्र में दहलीज़ को माँ लक्ष्मी के वास से जोड़ा गया है। मान्यता है कि जिस द्वार पर दहलीज़ नहीं होती, वहाँ लक्ष्मी जी सहजता से ठहरती नहीं। पर इसके पीछे एक व्यावहारिक तर्क भी है। दहलीज़ एक हल्की सी रुकावट की तरह काम करती है। जो अंदर की सकारात्मक ऊर्जा को धीरे से रोककर घर के भीतर बनाए रखती है।।

इतना ही नहीं बाहर से आने वाली अनावश्यक ऊर्जा तथा धूल-मिट्टी को भी कुछ हद तक रोकती है। यानी यह एक अदृश्य फिल्टर की तरह काम करती है। जो हर बार द्वार पार करने वाले हर व्यक्ति को एक पल के लिए रोककर सतर्क कर देती है। जिसे आज के समय में हम ठोकर समझकर हटा देते हैं, क्यों, क्योंकि हमें स्टाइलिस बनना है।।

तो सही ऊंचाई क्या मानी गई है।। So What Is Considered The Right Height.

मित्रों, अब आते हैं आज के असली सवाल पर। वास्तु परामर्शदाताओं के बीच सामान्यतः यह प्रचलित मान्यता है कि दहलीज़ की ऊंचाई फर्श से लगभग डेढ़ इंच से लेकर दो इंच के आसपास रखी जानी चाहिए। यह ऊंचाई इतनी हो कि पैर सहजता से इसे लांघ सके। पर इतनी भी कम न हो कि इसका अस्तित्व ही महसूस न हो। कुछ पुराने घरों में यह ऊंचाई तीन से चार इंच तक भी देखी जाती है। विशेषकर जहाँ द्वार की चौखट यानी शाखा भी अपेक्षाकृत भारी और चौड़ी बनाई गई हो। वहाँ दहलीज़ भी उसी अनुपात में थोड़ी ऊंची रखी जाती है।।

यहाँ एक ज़रूरी बात समझ लीजिए, कोई भी ठोस तथा सर्वमान्य आंकड़ा जो हर घर पर एक जैसा लागू हो, ऐसा नहीं है। बल्कि यह ऊंचाई द्वार की समग्र चौखट। चौखट की चौड़ाई तथा घर के समग्र माप-अनुपात के साथ संतुलन में रखी जाती है। इसीलिए अनुभवी वास्तुशास्त्री हमेशा यही सलाह देते हैं कि दहलीज़ की ऊंचाई द्वार की बाकी नाप के साथ तालमेल बिठाकर ही तय की जाए। अकेले किसी एक निश्चित नंबर पर अड़े रहना उचित नहीं होता।।

बहुत ऊंची या बिलकुल सपाट, दोनों गलत।। Neither Too High Nor Completely Flat.

मित्रों, दो चरम स्थितियों से बचना ज़रूरी है। पहली, दहलीज़ इतनी ऊंची हो कि रोज़ आते-जाते पैर अटकने लगे। या ठोकर लगने का डर बना रहे, यह व्यावहारिक तौर पर भी असुविधाजनक है। और वास्तु की दृष्टि से भी उचित नहीं माना जाता है। क्योंकि इससे द्वार पर बार-बार नकारात्मकता या चिड़चिड़ाहट पैदा होती है। दूसरी, दहलीज़ बिलकुल गायब हो, फर्श और बाहर का रास्ता एकदम बराबर हो, ऐसे में ऊर्जा को रोकने वाली वह हल्की रुकावट ही समाप्त हो जाती है। ऐसे में वास्तु शास्त्र इसे भी दोषपूर्ण मानता है। यानी संतुलन सबसे ज़रूरी है, ना बहुत ऊंची, ना बिलकुल सपाट।।

दहलीज़ किस चीज़ की बनी हो।। What Material Should The Threshold Be Made Of.

मित्रों, ऊंचाई के साथ-साथ दहलीज़ की सामग्री का भी ध्यान रखा जाता है। परंपरागत रूप से मजबूत लकड़ी अथवा पत्थर से बनी दहलीज़ को शुभ माना जाता है। यह टूटी-फूटी, खंडित अथवा बेतरतीब ढंग से बनी हुई भी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि टूटी हुई दहलीज़ को वास्तु दोष का सीधा संकेत माना जाता है। रंग की बात करें तो सफेद, पीला अथवा मेहरून रंग की दहलीज़ को शुभ फलदायी माना गया है।।

दहलीज़ से जुड़े कुछ ज़रूरी नियम।। Important Rules Related To The Threshold.

मित्रों, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जो भी व्यक्ति घर में प्रवेश करे, वह दहलीज़ को लांघकर ही अंदर आए, सीधे उसके ऊपर पैर रखकर अथवा उस पर बैठकर प्रवेश करना भी अशुभ माना जाता है। इसी कारण पुराने समय में बड़े-बुज़ुर्ग दहलीज़ पर बैठकर भोजन करने अथवा नाखून काटने से भी मना करते थे। नियमित रूप से दहलीज़ के पास दीपक जलाना तथा उसकी स्वच्छता बनाए रखना भी घर में सकारात्मक ऊर्जा तथा समृद्धि बनाए रखने में सहायक माना जाता है।।

निष्कर्ष, छोटी सी दहलीज़, बड़ा असर।। Conclusion, A Small Threshold With A Big Impact.

मित्रों, तो अब स्पष्ट है कि दहलीज़ महज एक डिज़ाइन एलिमेंट नहीं होता है। बल्कि द्वार की संपूर्ण वास्तु-संरचना का एक अभिन्न हिस्सा होता है। सामान्यतः डेढ़ से दो इंच के आसपास की ऊंचाई सबसे व्यावहारिक तथा शुभ मानी जाती है। परंतु असली फैसला हमेशा द्वार की चौखट के अनुपात को ही देखकर किया जाना चाहिए। ना बहुत ऊंची, ना बिलकुल सपाट, यही संतुलन दहलीज़ को सचमुच शुभ बनाता है।।

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