विदेश में जाकर शिक्षा प्राप्त करने का योग।।

Swami Ji Maharaj
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विदेश में जाकर शिक्षा प्राप्त करने का योग।। Yoga for Education Abroad in Kundli.

विदेश में जाकर शिक्षा प्राप्त करने का योग।। Yoga for Education Abroad in Kundli


विदेश-शिक्षा योग का ज्योतिषीय परिचय।। Introduction.

मित्रों, हमने पिछले लेख में यह समझा था कि उच्च शिक्षा का योग कुंडली में किस प्रकार देखा जाता है। परंतु वर्तमान युग में एक अन्य प्रश्न भी अत्यंत प्रमुखता से पूछा जाता है। अर्थात क्या जातक को विदेश जाकर शिक्षा ग्रहण करने का अवसर प्राप्त होगा। विदेश में अध्ययन न केवल उच्च गुणवत्ता की शिक्षा का प्रतीक माना जाता है। अपितु यह जातक के भविष्य में विदेश-निवास, अंतर्राष्ट्रीय करियर तथा व्यापक दृष्टिकोण के द्वार भी खोलता है।।

वैदिक ज्योतिष में विदेश में शिक्षा के योग का विश्लेषण करने के लिए मुख्य रूप से द्वादश भाव, अर्थात विदेश-गमन तथा व्यय का प्रमुख भाव। नवम भाव अर्थात उच्च शिक्षा का भाव। राहु ग्रह की भूमिका। तथा इन सभी के परस्पर संबंध का गहन अध्ययन किया जाना चाहिए। जब यह सभी कारक एक साथ शुभ स्थिति में मिलते हैं। तब कुंडली में विदेश में शिक्षा प्राप्त करने का प्रबल योग निर्मित होता है।।

मित्रों, यहाँ यह समझना भी अत्यंत आवश्यक है कि केवल उच्च शिक्षा का योग होना तथा विदेश में शिक्षा का योग होना। यह दोनों भिन्न-भिन्न परिस्थितियां हैं। जातक की कुंडली में उच्च शिक्षा का योग अत्यंत प्रबल हो सकता है। परंतु यदि द्वादश भाव तथा राहु का समुचित सहयोग न हो। तो उसकी शिक्षा स्वदेश में रहकर ही पूर्ण होती है। इसीलिए विदेश-गमन के लिए इन भिन्न कारकों का पृथक रूप से अध्ययन आवश्यक माना जाता है।।

तो आज हम विस्तार से समझेंगे कि द्वादश भाव तथा उसका स्वामी किस प्रकार विदेश में शिक्षा के योग को निर्धारित करते हैं। यहाँ यह भी देखना आवश्यक होता है, कि राहु की भूमिका क्या है। नवम भाव का इससे क्या संबंध है। तथा इस योग को और अधिक शीघ्रता से फलित करने के वैदिक उपाय कौन-कौन से हैं। इन सभी बातों को विस्तार से समझेंगे।।

द्वादश भाव तथा द्वादशेश की स्थिति।। Position of the Twelfth House and Its Lord.

मित्रों, द्वादश भाव को विदेश-गमन, विदेश-निवास तथा स्वदेश से दूरी का प्रमुख भाव माना गया है। अतः विदेश में शिक्षा के विश्लेषण में सर्वप्रथम इसी भाव का अध्ययन किया जाता है। यदि द्वादशेश बलवान होकर नवम भाव, पंचम भाव अथवा लग्न से शुभ संबंध बनाए। तो जातक को विदेश में शिक्षा प्राप्त करने के अवसर सहजता से प्राप्त होते हैं। तथा यह यात्रा सामान्यतः जातक के लिए लाभकारी तथा सफल सिद्ध होती है।।

इसके साथ ही यदि द्वादशेश स्वयं द्वादश भाव में ही स्थित हो, जिसे स्वक्षेत्री द्वादशेश कहा जाता है। तो यह भी विदेश-गमन का विशेष रूप से प्रबल तथा स्पष्ट संकेत माना जाता है। इसके विपरीत यदि द्वादश भाव पीड़ित अथवा निर्बल हो, तो विदेश जाने की इच्छा के बावजूद भी बार-बार बाधाएँ अथवा विलंब की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।।

राहु ग्रह की केंद्रीय भूमिका।। Central Role of Rahu.

मित्रों, राहु ग्रह को विदेशी भूमि, विदेशी संस्कृति तथा पश्चिमी अथवा आधुनिक शिक्षा-पद्धति का सबसे प्रमुख कारक ग्रह माना गया है। यदि राहु नवम भाव, पंचम भाव अथवा चतुर्थ भाव से शुभ संबंध बनाए। तो जातक का मन स्वाभाविक रूप से विदेश में अध्ययन की ओर आकर्षित होता है। तथा इस दिशा में उसे अप्रत्याशित रूप से सफलता भी प्राप्त हो सकती है।।

विशेष रूप से यदि राहु की महादशा अथवा अंतर्दशा शिक्षा-काल के दौरान सक्रिय हो, तो यह जातक को छात्रवृत्ति भी मिल जाता है। विदेशी विश्वविद्यालय में प्रवेश अथवा अचानक बनी किसी अनुकूल परिस्थिति के माध्यम से विदेश भेज देती है। परंतु राहु की प्रकृति के अनुरूप इस यात्रा में आरंभिक अनिश्चितता अथवा औपचारिकताओं में विलंब भी होता देखा गया है। जिसके लिए धैर्य आवश्यक होता है।।

नवम भाव तथा द्वादश भाव के परस्पर संबंध का महत्व।। Importance of the Relationship Between Ninth and Twelfth House.

मित्रों, केवल द्वादश भाव अथवा राहु की पृथक-पृथक शुभता ही पर्याप्त नहीं मानी जाती। अपितु नवम भाव, जो उच्च शिक्षा का कारक बताया गया है। तथा द्वादश भाव, जो विदेश-गमन का कारक है। इन दोनों के मध्य शुभ संबंध का होना भी अत्यंत आवश्यक है। यदि नवमेश तथा द्वादशेश परस्पर युति करें। राशि-परिवर्तन करें अथवा शुभ दृष्टि-संबंध बनाएं। तो यह विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने का सर्वाधिक प्रबल तथा स्पष्ट योग माना जाता है।।

इस प्रकार के शुभ संबंध से युक्त जातकों को सामान्यतः विदेश में प्रवेश की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत सरलता से पूर्ण होती हुई देखी जाती है। तथा वहाँ उनका अध्ययन भी सफलतापूर्वक तथा सम्मानजनक ढंग से संपन्न होता है।।

विदेश-शिक्षा में बाधा डालने वाले ग्रह-योग।। Planetary Combinations Causing Obstacles in Foreign Education.

मित्रों, यदि द्वादश भाव पर शनि की अशुभ दृष्टि हो, तो विदेश जाने की प्रक्रिया में अत्यधिक विलंब होता देखा गया है। साथ ही दस्तावेजी जटिलताएं अथवा वीज़ा-संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार यदि द्वादशेश षष्ठ भाव अर्थात शत्रु एवं बाधा के भाव में जाकर बैठ जाए। तो विदेश-गमन के प्रयासों में बार-बार असफलता की स्थिति भी बन जाती है।।

इसके अतिरिक्त यदि केतु द्वादश भाव पर प्रबल प्रभाव डाले। तो जातक का मन विदेश जाने के बाद भी स्वदेश की ओर खिंचा रहता है। जिसके कारण विदेश में स्थायित्व की भावना में कुछ कमी देखी जाती है। यद्यपि शिक्षा सफलतापूर्वक पूर्ण होने में इससे कोई विशेष बाधा नहीं आती।।

दशा-अंतर्दशा का विदेश में शिक्षा योग पर प्रभाव।। Effect of Dasha-Antardasha on Foreign Education Yoga.

मित्रों, कुंडली में विदेश में शिक्षा का योग चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, इसका वास्तविक फलितार्थ राहु, द्वादशेश अथवा नवमेश की महादशा अथवा अंतर्दशा सक्रिय होने पर ही प्राप्त होता है। सामान्यतः इन्हीं ग्रहों की दशा-अवधि में जातक को वीज़ा-स्वीकृति, विदेशी विश्वविद्यालय में प्रवेश अथवा छात्रवृत्ति जैसे शुभ परिणाम प्राप्त होते हुए देखे जाते हैं।।

ऐसे जातकों को अपनी दशा-अंतर्दशा का सूक्ष्म विश्लेषण करवाकर, इस अनुकूल समयावधि में प्रवेश-आवेदन तथा दस्तावेजी प्रक्रिया को अधिक तीव्रता के साथ आगे बढ़ाना चाहिए। ताकि इस शुभ दशा-काल का पूर्ण लाभ प्राप्त किया जा सके।।

विदेश में शिक्षा के योग को बलवान बनाने के वैदिक उपाय।। Vedic Remedies to Strengthen Foreign Education Yoga.

मित्रों, विदेश में शिक्षा के योग को शीघ्रता से सक्रिय करने के लिए शनिवार के दिन राहु देवता की शांति हेतु "ॐ रां राहवे नमः" इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक नियमित जप करना चाहिए। इसके साथ ही दुर्गा सप्तशती का पाठ भी राहु संबंधी अनिश्चितता को शांत करने में विशेष सहायक सिद्ध होता है।।

इसके अतिरिक्त गुरुवार के दिन गुरु देवता की उपासना तथा "ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः" इस मंत्र का जप भी, क्योंकि गुरु उच्च शिक्षा का भी कारक है। इस योग को अधिक सुदृढ़ बनाता है। शनिवार को काले तिल तथा उड़द का दान, तथा दस्तावेजी कार्यों के आरंभ में गणपति जी का स्मरण करना भी शुभ फलदायी माना जाता है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में द्वादश भाव को विदेश-गमन का प्रमुख भाव बताया गया है। तथा राहु को विदेशी भूमि का प्रत्यक्ष कारक ग्रह माना गया है। फलदीपिका के अनुसार नवमेश तथा द्वादशेश के मध्य शुभ संबंध विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्ति का सर्वाधिक प्रबल आधार माना जाता है।।

सारावली में भी यह स्पष्ट किया गया है कि राहु की महादशा-अंतर्दशा में बने विदेश-योग का फल सर्वाधिक तीव्रता तथा स्पष्टता के साथ प्राप्त होता है। अतः किसी भी निर्णायक निष्कर्ष के लिए संपूर्ण जन्मकुंडली तथा दशा-अंतर्दशा का समन्वित अध्ययन आवश्यक माना जाता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. विदेश-शिक्षा के योग के लिए कुंडली का कौन-सा भाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।। Which House Is Most Important for Foreign Education Yoga.

उत्तर:- द्वादश भाव को विदेश-गमन का प्रमुख भाव माना जाता है। तथा इसका नवम भाव से शुभ संबंध इस योग को और प्रबल बनाता है।।

प्रश्न 2. विदेश में शिक्षा के योग में राहु की क्या भूमिका होती है।। What Is the Role of Rahu in Foreign Education.

उत्तर:- राहु को विदेशी भूमि तथा आधुनिक शिक्षा-पद्धति का प्रमुख कारक माना जाता है। तथा इसका नवम अथवा चतुर्थ भाव से शुभ संबंध विदेश में शिक्षा की प्रबल संभावना बनाता है।।

प्रश्न 3. विदेश जाने की प्रक्रिया में बाधा कब आती है।। When Do Obstacles Arise in the Process of Going Abroad.

उत्तर:- यदि द्वादश भाव पर शनि की अशुभ दृष्टि हो, अथवा द्वादशेश षष्ठ भाव में स्थित हो, तो वीज़ा तथा दस्तावेजी प्रक्रिया में विलंब होने की संभावना बनती है।।

प्रश्न 4. क्या उच्च शिक्षा का योग होने पर विदेश में शिक्षा स्वतः निश्चित हो जाती है।। Is Foreign Education Automatically Confirmed if Higher Education Yoga Exists.

उत्तर:- नहीं, इसके लिए द्वादश भाव तथा राहु का भी पृथक रूप से शुभ होना आवश्यक है। अन्यथा उच्च शिक्षा स्वदेश में रहकर भी पूर्ण हो जाती है।।

प्रश्न 5. विदेश-शिक्षा योग को बलवान बनाने का सबसे प्रभावी उपाय क्या है।। What Is the Most Effective Remedy to Strengthen Foreign Education Yoga.

उत्तर:- राहु तथा गुरु देवता के मंत्रों का नियमित जप, तथा शनिवार को दान-पुण्य सबसे प्रभावी उपाय माने जाते हैं।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, कुंडली में विदेश में शिक्षा का योग मुख्य रूप से द्वादश भाव तथा द्वादशेश की स्थिति, राहु ग्रह का बल, नवम भाव तथा द्वादश भाव के परस्पर संबंध, तथा संबंधित ग्रहों की अनुकूल दशा-अंतर्दशा पर निर्भर करता है। इन सभी कारकों का समन्वित अध्ययन करके ही यह निश्चित रूप से जाना जा सकता है कि जातक की कुंडली में यह विशिष्ट योग विद्यमान है अथवा नहीं।।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु तथा गुरु देवता की नियमित उपासना इस योग को अधिक शीघ्रता से सक्रिय करने में सहायक मानी गई है। और यहाँ मैं यही कहूँगा कि आध्यात्मिक उपायों के साथ-साथ दस्तावेजी तैयारी, भाषा-कौशल तथा धैर्य बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होता है।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि इस विषय पर किसी भी निर्णायक निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले किसी विद्वान, योग्य, अनुभवी वैदिक ज्योतिषी से अपनी संपूर्ण जन्मकुंडली का विश्लेषण विधिपूर्वक अवश्य करवाना चाहिए। ताकि सही एवं व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।।

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