नवरात्रि में अष्टमी और नवमी के पूजन का सही विधान।।

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नवरात्रि में अष्टमी और नवमी के पूजन का सही विधान।। Ashtami And Navami Puja in Navratri.

नवरात्रि में अष्टमी और नवमी के पूजन का सही विधान।। Ashtami And Navami Puja in Navratri


अष्टमी-नवमी पूजन का परिचय।। Introduction.

मित्रों, हमने पिछले लेख में नवरात्रि के नौ दिनों में माता के नौ स्वरूपों की पूजा का क्रम समझा था। परंतु इन नौ दिनों में अष्टमी तथा नवमी का स्थान विशेष माना जाता है। क्योंकि इन्हीं दो तिथियों में पूरे नवरात्रि की साधना अपनी पूर्णता की ओर बढ़ती है। अष्टमी को महाष्टमी तथा नवमी को महानवमी कहा जाता है। और इन्हीं दिनों में कन्या-पूजन तथा हवन भी करना चाहिए। साथ ही संधि-पूजा तथा हवन की पूर्णाहुति जैसे प्रमुख अनुष्ठान संपन्न किया जाता है।।

परंतु मित्रों, प्रत्येक वर्ष इन्हीं दो दिनों को लेकर सबसे अधिक संशय भी देखा जाता है। कन्या-पूजन अष्टमी को करें अथवा नवमी को। हवन किस समय करें। कितनी कन्याओं को बुलाएँ। भोजन में क्या बनाएँ। यदि दोनों तिथियाँ एक ही दिन पड़ जाएँ, तो क्या करें। इन प्रश्नों का उत्तर न मिलने पर श्रद्धालु कई बार अनावश्यक चिंता में पड़ जाते हैं।।

इसी कारण आज हम इस विषय को सरल रूप में समझेंगे। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दूँ कि अष्टमी-नवमी के अनुष्ठानों में क्षेत्र तथा कुल-परंपरा के अनुसार अनेक भिन्नताएँ भी मिलती हैं। इसलिए जो विधान आज हम बताएँगे, वह सामान्य तथा प्रचलित परंपरा पर आधारित है। तथा अपने घर की रीति को सदैव सर्वोपरि रखना ही उचित होता है।।

तो आज हम विस्तार से समझेंगे कि अष्टमी तथा नवमी का महत्व क्या होता है। अष्टमी का पूजन किस प्रकार करना चाहिए। संधि-पूजा क्या होती है। कन्या-पूजन की सही विधि क्या है। नवमी का हवन तथा पूर्णाहुति कैसे करें। तथा तिथि-संबंधी संशय की स्थिति में क्या निर्णय लें। इन सभी बातों को आज हम इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।।

महाष्टमी का महत्व।। Significance of Mahashtami.

मित्रों, आश्विन शुक्ल अष्टमी को महाष्टमी अथवा दुर्गाष्टमी कहा जाता है। इस दिन माता के आठवें स्वरूप महागौरी की उपासना की जाती है। कथा के अनुसार कठोर तप के कारण देवी का वर्ण श्याम पड़ गया था, जिसे भगवान शिव ने गंगाजल से धोकर पुनः गौर वर्ण प्रदान किया। और तभी से वे महागौरी कहलाईं। इन्हें पवित्रता, शांति तथा करुणा का स्वरूप माना जाता है।।

अष्टमी का महत्व इसलिए भी माना जाता है, क्योंकि परंपरा में इसे देवी की शक्ति के चरम प्रकटीकरण का दिन कहा गया है। अनेक क्षेत्रों में, विशेषकर बंगाल, ओडिशा तथा पूर्वी भारत में, महाष्टमी दुर्गा-पूजा का सर्वाधिक प्रमुख दिन होता है। उत्तर भारत में इसी दिन कन्या-पूजन तथा व्रत-समापन की परंपरा अधिक प्रचलित है।।

यहाँ यह भी ध्यान रखें कि अष्टमी के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु प्रायः पूरे दिन उपवास रखकर कन्या-पूजन के पश्चात ही अन्न अथवा प्रसाद ग्रहण करते हैं। परंतु यह भी कुल-परंपरा पर ही निर्भर रहता है। क्योंकि कई परिवारों में यह कार्य नवमी को किया जाता है। इसलिए अपने परिवार की पुरानी रीति को ही आधार बनाया जाना चाहिए।।

अष्टमी के दिन का पूजन-विधान।। Method of Worship on Ashtami.

मित्रों, अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें तथा पूजा-स्थान को शुद्ध करें। सर्वप्रथम श्रीगणेश जी तथा कलश का पूजन करें। फिर माता महागौरी का ध्यान करके उनका आवाहन करें। उन्हें रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा श्रृंगार-सामग्री भी अर्पित करें। चुनरी, चूड़ी तथा सिंदूर अर्पित करना भी परंपरा में शुभ माना गया है।।

माता महागौरी के पूजन में "ॐ देवी महागौर्यै नमः" मंत्र का जप किया जाता है। इस दिन प्रचलित भोग नारियल अथवा नारियल से बनी मिठाई का माना जाता है। इसके पश्चात दुर्गा सप्तशती, देवी कवच अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ करके फिर आरती करना चाहिए। यदि पाठ संभव न हो, तो नवार्ण मंत्र का जप भी पर्याप्त श्रद्धापूर्ण माना जाता है।।

अनेक परिवारों में अष्टमी की रात्रि में विशेष जागरण अथवा देवी-भजन की भी परंपरा है। जो लोग यह कर सकें, वे अपने सामर्थ्य के अनुसार इसे अपनाएँ। परंतु जिन्हें स्वास्थ्य अथवा परिस्थिति के कारण यह संभव न हो। वे केवल सायंकाल की आरती तथा भजन से भी साधना पूर्ण हो जाता है।।

संधि-पूजा क्या है।। What Is Sandhi Puja.

मित्रों, अष्टमी तथा नवमी तिथि के मिलन-काल को संधि-काल कहा जाता है। और इस समय की जाने वाली विशेष पूजा को संधि-पूजा कहते हैं। परंपरा में अष्टमी के अंतिम चौबीस मिनट तथा नवमी के आरंभिक चौबीस मिनट, अर्थात कुल लगभग अड़तालीस मिनट का यह समय अत्यंत पावन तथा शक्तिशाली माना गया है। कहा जाता है कि इसी क्षण माता चामुंडा ने चंड तथा मुंड नामक असुरों का वध किया था।।

संधि-पूजा बंगाल तथा पूर्वी भारत की दुर्गा-पूजा में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। वहाँ इस समय एक सौ आठ दीपक जलाए जाते हैं तथा एक सौ आठ कमल-पुष्प अर्पित किए जाते हैं। इस पूजा का समय प्रत्येक वर्ष पंचांग की गणना से सटीक मिनट तक निर्धारित किया जाता है। इसलिए इसे केवल अनुमान से नहीं, अपितु पंचांग देखकर अथवा किसी विद्वान ब्राह्मण से पूछकर ही करना चाहिए।।

घर में साधारण रूप से संधि-काल के समय माता के समक्ष घी का दीपक जलाकर नवार्ण मंत्र का जप करना भी पर्याप्त माना जाता है। जो परिवार इस परंपरा का पालन नहीं करते, उनके लिए यह अनिवार्य नहीं है। इसे केवल उन्हीं को अपनाना चाहिए, जिनकी कुल-परंपरा में यह पहले से चली आ रही हो।।

कन्या-पूजन का महत्व।। Importance of Kanya Pujan.

मित्रों, कन्या-पूजन को नवरात्रि का सबसे प्रिय अनुष्ठान माना जाता है। क्योंकि इसमें कन्या को देवी का प्रत्यक्ष स्वरूप मानकर पूजा जाता है। देवी-उपासना की परंपरा में कहा गया है कि नौ दिनों तक किया गया जप, पाठ तथा व्रत भी कन्या-पूजन के बिना अपूर्ण समझा जाता है। इसीलिए अनेक परिवार इसे व्रत-समापन का अनिवार्य अंग मानते हैं।।

कन्या-पूजन का भाव केवल भोजन कराना नहीं है, अपितु नारी-शक्ति के प्रति सम्मान तथा कृतज्ञता प्रकट करना भी है। जिस घर में कन्या को देवी की भाँति आदर मिलता है, वहाँ माता की कृपा बनी रहती है, ऐसी मान्यता है। इसलिए इस अनुष्ठान को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, अपितु पूर्ण श्रद्धा तथा स्नेह के साथ करना चाहिए।।

कुछ परंपराओं में कन्या की आयु के अनुसार उनके अलग-अलग नाम बताए गए हैं। जैसे दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कल्याणी तथा इसी प्रकार दस वर्ष तक की कन्याएँ। यह भेद ग्रंथों तथा परंपराओं में एक समान नहीं मिलता। इसलिए इसे केवल जानकारी के रूप में रखें। तथा व्यवहार में अपने कुल की रीति का पालन करें।।

कन्या-पूजन की विधि।। Method of Kanya Pujan.

मित्रों, कन्या-पूजन के लिए प्रायः दो से दस वर्ष तक की नौ कन्याओं तथा एक बालक को भी आमंत्रित किया जाता है। जिसे भैरव अथवा लांगुर वीर का स्वरूप माना जाता है। यदि नौ कन्याएँ उपलब्ध न हों, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार कम संख्या में भी श्रद्धा से पूजन किया जा सकता है। संख्या से अधिक भाव को महत्व दिया गया है।।

कन्याओं के आने पर सर्वप्रथम उनका स्वागत करें तथा उन्हें स्वच्छ आसन पर बिठाएँ। उनके चरण जल अथवा दूध से धोएँ तथा स्वच्छ वस्त्र से पोंछें। फिर रोली, अक्षत से तिलक करें, हाथ में कलावा बाँधें, चुनरी अथवा वस्त्र अर्पित करें तथा पुष्प चढ़ाकर आरती करें। यह सब उनके प्रति माता के भाव से किया जाता है।।

इसके पश्चात उन्हें श्रद्धापूर्वक भोजन कराएँ। प्रचलित परंपरा में हलवा, पूरी तथा काले चने का प्रसाद परोसा जाता है। परंतु इसमें भी कुछ क्षेत्रीय भेद हो सकता है। भोजन के बाद उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, उपहार अथवा आवश्यक वस्तुएँ देकर विदा करना चाहिए। साथ ही उन कन्याओं के चरण छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए। अंत में स्वयं प्रसाद ग्रहण करके व्रत को खोलना चाहिए।।

कन्या-पूजन में रखने योग्य सावधानियाँ।। Precautions in Kanya Pujan.

मित्रों, इस अनुष्ठान में सबसे पहली बात यह है कि बच्चों के स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखें। भोजन ताजा, स्वच्छ तथा हल्का हो, तथा अत्यधिक तला-भुना अथवा बहुत मीठा भोजन न परोसें। किसी बच्चे को यदि किसी वस्तु से असुविधा हो, तो उसकी जानकारी पहले ही ले लें। यदि किसी कन्या की तबीयत ठीक न हो, तो उसे भोजन के लिए आग्रह न करें।।

दूसरी बात यह है कि कन्या-पूजन में भेदभाव अथवा दिखावे से बचना चाहिए। केवल संपन्न परिवारों की कन्याओं को नहीं, अपितु जरूरतमंद परिवारों की कन्याओं को भी सम्मान सहित आमंत्रित करना अधिक पुण्यदायी माना गया है। बच्चों को आने के लिए दबाव न डालें तथा उनके माता-पिता की सहमति तथा सुविधा का भी ध्यान रखें।।

तीसरी बात, कन्याओं को केवल कुछ मिनटों के लिए बिठाकर शीघ्रता से विदा करने की प्रवृत्ति से बचें। उन्हें स्नेहपूर्वक बैठाएँ, उनसे प्रेम से बात करें तथा उनके साथ समय बिताएँ। यही भाव इस पूजन को सार्थक बनाता है। बाह्य सजावट से अधिक उनके प्रति आदर तथा आत्मीयता ही माता को प्रिय होता है।।

महानवमी का महत्व एवं पूजन।। Significance and Worship of Mahanavami.

मित्रों, अश्विन शुक्ल नवमी को महानवमी भी कहा जाता है। तथा इस दिन माता के नवम स्वरूप सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है। इन्हें समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाली देवी माना गया है। परंपरा में कहा जाता है कि भगवान शिव को भी सिद्धियाँ इन्हीं की कृपा से प्राप्त हुई थीं। इनका आसन कमल तथा वाहन सिंह माना गया है।।

इस दिन प्रातःकाल स्नान करके माता सिद्धिदात्री का ध्यान करें तथा "ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः" इस मंत्र का जप करें। उन्हें पुष्प, फल, नैवेद्य तथा तिल, अनार अथवा हलवा-पूरी का भोग भी अर्पित करें। जो परिवार अष्टमी को कन्या-पूजन नहीं करते, वे प्रायः नवमी के दिन ही कन्या-पूजन तथा हवन करते हैं।।

नवमी को पूरे नौ दिनों की साधना का अंतिम दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन विशेष कृतज्ञता का भाव रखें। नौ दिनों में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें तथा माता से आशीर्वाद की प्रार्थना करें। यह भाव ही नवमी के पूजन को पूर्णता प्रदान करता है।।

हवन एवं पूर्णाहुति की विधि।। Method of Havan and Purnahuti.

मित्रों, नवरात्रि की पूर्णता में हवन का विशेष स्थान है। परंपरा में दुर्गा सप्तशती के पाठ के अंत में उसके मंत्रों अथवा नवार्ण मंत्र से हवन किया जाता है। हवन के लिए शुद्ध आम की समिधा, गाय का घी, काले तिल, जौ, चावल, कपूर, गुग्गुल तथा अन्य हवन-सामग्री का प्रयोग प्रचलित है। हवन-कुंड पूजा-स्थान के समीप स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें।।

हवन आरंभ करने से पहले श्रीगणेश जी, अग्नि देव तथा माता का स्मरण करें फिर संकल्प लेना चाहिए। फिर नवार्ण मंत्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा" से एक सौ आठ अथवा अपनी सामर्थ्य के अनुसार आहुतियाँ देना चाहिए। प्रत्येक आहुति के साथ श्रद्धा तथा एकाग्रता बनाए रखें। साथ ही अंत में पूर्णाहुति के रूप में नारियल अर्पित करें।।

हवन के पश्चात आरती करें तथा क्षमा-प्रार्थना करें। यदि घर में हवन करना संभव न हो, तो किसी विद्वान ब्राह्मण से करवाया जा सकता है। एक और विकल्प के रुप में दीपक जलाकर नवार्ण मंत्र का जप भी किया जा सकता है। हवन करते समय अग्नि की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखें। विशेषकर घर के भीतर अथवा अपार्टमेंट में, जहाँ धुएँ तथा आग से सावधानी आवश्यक हो वहां करना चाहिए।।

बलि की परंपरा का प्रतीकात्मक स्वरूप।। Symbolic Form of the Bali Tradition.

मित्रों, कुछ क्षेत्रों तथा शाक्त परंपराओं में अष्टमी अथवा नवमी के दिन बलि की प्रथा का उल्लेख मिलता है। परंतु वर्तमान समय में अधिकांश परिवारों में यह परंपरा प्रतीकात्मक रूप में ही निभाई जाती है। जिसमें जीव की बलि के स्थान पर कुम्हड़ा, नारियल, नींबू अथवा ईख जैसे पदार्थों को तोड़-फोड़कर करने का विधान बताया गया है। इसे भीतर के दोषों, जैसे अहंकार तथा क्रोध, के त्याग का प्रतीक भी माना जाता है।।

जो परिवार इस परंपरा से जुड़े हों, वे अपने कुल-रीति तथा किसी विद्वान ब्राह्मण के मार्गदर्शन के अनुसार ही इसे संपन्न करें। जिनके घर में यह परंपरा नहीं है, उनके लिए इसे अपनाना किसी भी रूप में आवश्यक नहीं है। केवल नारियल की पूर्णाहुति ही पर्याप्त मानी जाती है। पूजन का मूल भाव शुद्धि तथा समर्पण ही बताया गया है।।

अष्टमी-नवमी की तिथि-संबंधी संशय का समाधान।। Resolving Doubts About the Tithi of Ashtami-Navami.

मित्रों, पंचांग की गणना के कारण कभी अष्टमी तथा नवमी दो अलग दिन पड़ती हैं। कभी-कभी दोनों एक ही दिन आ जाती हैं। तथा कभी कोई एक तिथि घट-बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में कन्या-पूजन तथा हवन का दिन निश्चित करने के लिए स्थानीय पंचांग का ही आधार लेना चाहिए। इसीलिए प्रत्येक वर्ष कोई स्थायी तिथि मानकर नहीं चलना चाहिए।।

यदि दोनों तिथियाँ एक ही दिन हों, तो परंपरा में उसी दिन का उपयोग दोनों के अनुष्ठान हेतु किया जाता है। तथा संधि-काल का समय भी उसी के अनुसार निर्धारित होता है। यदि निर्णय में भ्रम हो, तो अपने क्षेत्र के विद्वान ब्राह्मण अथवा स्थानीय किसी विद्वान ज्योतिषी से पूछ लेना सबसे सरल उपाय है। इससे बिना चिंता के पूजन संपन्न किया जा सकता है।।

साथ ही यह भी स्मरण रखें कि इन तिथियों को लेकर पंचांगों के बीच कभी-कभी थोड़े भेद मिलते हैं। इसलिए अपने परिवार जिस पंचांग अथवा परंपरा का अनुसरण करता आया है। उसी का पालन करना श्रेयस्कर माना जाता है।।

विसर्जन, पारण तथा समापन।। Visarjan, Parana and Conclusion.

मित्रों, अष्टमी-नवमी के पूजन के पश्चात नवरात्रि का समापन किया जाता है। अनेक परिवारों में नवमी के हवन तथा कन्या-पूजन के बाद अथवा दशमी के दिन कलश का विसर्जन होता है। कलश के जल को घर में छिड़का जाता है तथा नारियल प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है। नवरात्रि के आरंभ में बोए गए जौ के अंकुर, जिन्हें जवारे कहते हैं, उन्हें भी श्रद्धा से घर में रखा अथवा जल में प्रवाहित किया जाता है।।

व्रत का पारण सामान्यतः कन्या-पूजन के पश्चात अथवा दशमी के दिन किया जाता है। तथा यह कुल-परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है। जिन्होंने अखंड ज्योति जलाई हो, वे उसका समापन भी इसी समय विधिपूर्वक करें। दशमी के दिन विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। जो नवरात्रि की साधना के विजय के रूप में पूर्ण होने का संदेश देता है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, दुर्गा सप्तशती में शरत्काल की महापूजा का उल्लेख मिलता है। जिसमें देवी स्वयं अपने माहात्म्य के श्रवण तथा पूजन का फल बताती हैं। देवीभागवत पुराण में नवरात्रि की महिमा, कन्या-पूजन का महत्व तथा कुमारी पूजन की विधि का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में कन्या को देवी का साक्षात स्वरूप मानकर पूजने की परंपरा बताई गई है।।

धर्मसिंधु तथा निर्णयसिंधु जैसे निबंध-ग्रंथों में अष्टमी-नवमी की तिथि-निर्णय, संधि-पूजा तथा व्रत-विधि का विवेचन मिलता है। परंतु इन ग्रंथों तथा क्षेत्रीय परंपराओं में अनेक भेद भी पाए जाते हैं। इसलिए किसी भी सूक्ष्म नियम के विषय में अपने कुल-गुरु अथवा अनुभवी एवं किसी विद्वान ब्राह्मण का मार्गदर्शन लेना सदैव उचित है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. कन्या-पूजन अष्टमी को करें अथवा नवमी को।। Should Kanya Pujan Be Done on Ashtami or Navami.

उत्तर:- दोनों ही दिन कन्या-पूजन की परंपरा है। यह आपकी कुल-परंपरा तथा उस वर्ष की तिथि-स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए पंचांग अथवा किसी अनुभवी विद्वान ब्राह्मण से पुष्टि कर लें।।

प्रश्न 2. कन्या-पूजन में कितनी कन्याओं को बुलाना चाहिए।। How Many Girls Should Be Invited for Kanya Pujan.

उत्तर:- सामान्यतः नौ कन्याओं तथा एक बालक को बुलाया जाता है। परंतु सामर्थ्य न हो तो कम संख्या में भी श्रद्धापूर्वक पूजन किया जा सकता है।।

प्रश्न 3. संधि-पूजा क्या होती है।। What Is Sandhi Puja.

उत्तर:- अष्टमी के अंतिम तथा नवमी के आरंभिक 24-24 मिनटों को संधि-काल कहा जाता है। इसी समय में की जाने वाली विशेष पूजा को संधि-पूजा कहा जाता है। जो बंगाल तथा पूर्वी भारत में विशेष प्रचलित है।।

प्रश्न 4. नवमी के हवन में किस मंत्र का प्रयोग किया जाता है।। Which Mantra Is Used in the Navami Havan.

उत्तर:- सामान्यतः नवार्ण मंत्र अथवा दुर्गा सप्तशती के मंत्रों से आहुतियाँ दी जाती हैं तथा पूर्णाहुति में नारियल अर्पित किया जाता है।।

प्रश्न 5. यदि अष्टमी तथा नवमी एक ही दिन पड़ जाएँ तो क्या करें।। What to Do If Ashtami and Navami Fall on the Same Day.

उत्तर:- ऐसी स्थिति में पंचांग तथा किसी विद्वान ब्राह्मण के मार्गदर्शन से उसी दिन दोनों का पूजन किया जाता है। तथा संधि-काल का समय भी उसी के अनुसार निश्चित होता है।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, अष्टमी तथा नवमी नवरात्रि की साधना के शिखर-बिंदु होते हैं। अष्टमी में महागौरी की उपासना, संधि-काल की पूजा तथा कन्या-पूजन, और नवमी में सिद्धिदात्री का पूजन, हवन तथा पूर्णाहुति, इन सभी का संयुक्त स्वरूप नौ दिनों की साधना को एक सुंदर समापन प्रदान करता है। प्रत्येक अनुष्ठान के मूल में माता के प्रति कृतज्ञता तथा श्रद्धा का भाव ही प्रधान होता है।।

इस विषय में मैं यही कहूँगा कि विधि-विधान महत्वपूर्ण होता हैं। परंतु उनका उद्देश्य भय अथवा संशय उत्पन्न करना नहीं होता। यदि किसी कारण से संधि-पूजा अथवा बड़े हवन का आयोजन संभव न हो, तो भी श्रद्धापूर्वक किया गया कन्या-पूजन, आरती तथा नवार्ण मंत्र का जप माता को सहज स्वीकार होता है। कन्या के प्रति स्नेह तथा आदर ही इन दिनों की सबसे बड़ी पूजा है।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि अपनी कुल-परंपरा, क्षेत्र तथा उस वर्ष की तिथि-स्थिति के अनुसार किसी विद्वान, योग्य एवं अनुभवी ब्राह्मण से मार्गदर्शन अवश्य लेना चाहिए। ताकि अष्टमी-नवमी का पूजन पूर्ण विधि-विधान तथा निश्चिंत मन से संपन्न हो सके। आप सभी सनातनियों को नवरात्रि के इस पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।।

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