नवरात्रि में किसी साधना से सिद्धि कैसे प्राप्त करें।।

Swami Ji Maharaj
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नवरात्रि में किसी साधना से सिद्धि कैसे प्राप्त करें।। Sadhana Se Siddhi During Navratri.

नवरात्रि में किसी साधना से सिद्धि कैसे प्राप्त करें।। Sadhana Se Siddhi During Navratri


साधना से सिद्धि का वैदिक परिचय।। Introduction.

मित्रों, नवरात्रि के नौ दिवस को वैदिक परंपरा में साधना की दृष्टि से सर्वाधिक शक्तिशाली तथा दुर्लभ अवसर माना गया है। क्योंकि इन नौ दिनों में माँ भगवती की समस्त शक्तियाँ पृथ्वी-लोक पर अत्यंत सक्रिय तथा प्रबल रूप में विद्यमान रहती हैं। "साधना" का अर्थ है निरंतर, नियमपूर्वक तथा संकल्पपूर्वक किया गया अनुष्ठान। तथा "सिद्धि" का अर्थ है उस अनुष्ठान का पूर्ण तथा स्थायी फल प्राप्त हो जाना। मान्यता है कि जो साधना वर्षभर में कठिनता से सिद्ध होती है। वही साधना नवरात्रि के नौ दिनों में अत्यंत शीघ्रता तथा सरलता से सिद्ध हो जाती है। क्योंकि इस काल में सृष्टि की समस्त तामसिक तथा विघ्नकारी शक्तियाँ निर्बल पड़ जाती हैं। तथा सात्विक एवं दैवीय शक्तियाँ अत्यंत प्रबल हो जाती हैं।।

वैदिक शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि नवरात्रि-काल में संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा एक विशेष लय में कंपित होती है। जिसे साधक अपनी साधना के माध्यम से आत्मसात करके असाधारण फल प्राप्त कर सकता है। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनि, तांत्रिक तथा साधक इन नौ दिनों में विशेष रूप से मंत्र-सिद्धि, यंत्र-सिद्धि तथा देवी-साधना में संलग्न होते रहे हैं। जो साधक अपने जीवन में किसी विशेष सिद्धि, मनोकामना-पूर्ति अथवा आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखते हैं। उनके लिए यह नौ दिवस सर्वाधिक शुभ तथा शुभ फलदायी अवसर माने जाते हैं।।

परन्तु आप बिलकुल घबराएँ नहीं। आज हम इसी विषय पर विस्तार से समझेंगे कि साधना आरंभ करने से पूर्व कौन सी तैयारी आवश्यक है। साधना-स्थल तथा आसन का चयन किस प्रकार करें। संकल्प तथा गुरु-स्मरण का क्या महत्व होता है। मंत्र-जप की संपूर्ण विधि क्या है। साधना-काल में किन नियमों का पालन अनिवार्य होता है। तथा सिद्धि के क्या लक्षण प्रकट होते हैं। आज के इस लेख में हम इसी विषय को विस्तार से समझेंगे।।

साधना आरंभ करने से पूर्व आवश्यक तैयारी।। Essential Preparation Before Beginning Sadhana.

मित्रों, किसी भी साधना को आरंभ करने से पूर्व साधक को अपने मन में स्पष्ट तथा दृढ़ संकल्प का निर्धारण कर लेना चाहिए। क्योंकि अस्पष्ट अथवा डगमगाते हुए मन से की गई साधना कभी भी पूर्ण सिद्धि नहीं देती। सर्वप्रथम यह निश्चित करना चाहिए कि साधक किस देवी-स्वरूप की, किस मंत्र की तथा किस प्रयोजन हेतु साधना करना चाहता है। चाहे वह धन-प्राप्ति हो, विद्या-प्राप्ति हो, आरोग्य-प्राप्ति हो अथवा केवल आध्यात्मिक उन्नति हो। प्रयोजन जितना स्पष्ट होगा, साधना की सफलता की संभावना भी उतनी ही अधिक प्रबल होगी।।

इसके साथ ही साधना में उपयोग होने वाली संपूर्ण सामग्री, जैसे आसन, माला, धूप-दीप, यंत्र अथवा प्रतिमा इन सभी की व्यवस्था साधना आरंभ होने से पूर्व ही कर लेनी चाहिए। साधना के मध्य में उठकर सामग्री जुटाना अथवा साधना को बीच में रोकना। साधना के प्रवाह तथा संकल्प-शक्ति को क्षीण कर देता है। इसके अतिरिक्त साधना-काल में शरीर, वस्त्र तथा मन की संपूर्ण शुद्धता भी अत्यंत आवश्यक मानी जाती है। क्योंकि अशुद्ध शरीर तथा चंचल मन से की गई साधना का फल भी अधूरा ही रह जाता है।।

साधना-स्थल तथा आसन का चयन।। Selection Of Sadhana Sthal And Aasan.

मित्रों, साधना के लिए स्थान का चयन अत्यंत सावधानीपूर्वक करना चाहिए। यह स्थान शांत, एकांत तथा नियमित रूप से स्वच्छ रखा जाने वाला होना चाहिए। जहाँ साधना के समय किसी प्रकार का व्यवधान अथवा शोर-गुल नहीं होना चाहिए। यदि संभव हो, तो घर के ईशान कोण अथवा उत्तर-पूर्व दिशा में साधना-स्थल निर्धारित करना सर्वाधिक शुभ माना जाता है। क्योंकि यह दिशा देवताओं के वास तथा सात्विक ऊर्जा की दिशा मानी जाती है। साधना-स्थल को प्रतिदिन गंगाजल से शुद्ध करना चाहिए। तथा वहाँ एक निश्चित तथा स्थायी स्थान पर ही साधना करनी चाहिए। क्योंकि स्थान परिवर्तन करते रहने से साधना की निरंतरता तथा ऊर्जा-संचय दोनों प्रभावित होते हैं।।

इसके साथ ही आसन का चयन भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है, जितना स्थान का चयन। देवी-साधना के लिए लाल अथवा पीले रंग का ऊनी अथवा कुशा का आसन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि यह पृथ्वी की ऊर्जा से साधक को पृथक रखते हुए, साधना के दौरान उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म ऊर्जा को शरीर में ही संचित रखने में सहायक होता है। आसन को कभी भी दूसरों के साथ साझा नहीं करना चाहिए। तथा साधना-काल की संपूर्ण अवधि में एक ही आसन का उपयोग करना चाहिए। ताकि आसन में भी साधना की ऊर्जा संचित होती रहे।।

संकल्प एवं गुरु-स्मरण का महत्व।। Importance Of Sankalp And Guru Smaran.

मित्रों, साधना आरंभ करने से पूर्व संकल्प लेना शास्त्रों में अनिवार्य बताया गया है। संकल्प में साधक को अपना नाम, गोत्र, स्थान, साधना का प्रयोजन तथा साधना की अवधि का स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए। यह संकल्प साधना को एक निश्चित दिशा तथा संकल्प-शक्ति प्रदान करता है। जिसके बिना की गई साधना दिशाहीन तथा अपूर्ण मानी जाती है। संकल्प लेते समय दाहिने हाथ में जल, अक्षत तथा पुष्प लेकर, माता भगवती तथा इष्ट-देव का स्मरण करते हुए संकल्प-वाक्य का उच्चारण करना चाहिए।।

इसके पश्चात गुरु-स्मरण अथवा गुरु-वंदना करना भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है। चाहे साधक को किसी गुरु से दीक्षा प्राप्त हो अथवा ना हो। क्योंकि वैदिक परंपरा में यह माना जाता है कि गुरु-तत्व के बिना कोई भी साधना पूर्ण फल नहीं देती। जिन साधकों को दीक्षा अर्थात गुरु प्राप्त ना हो, वे परमगुरु अर्थात स्वयं भगवान शिव अथवा माँ आदिशक्ति का स्मरण करके भी गुरु-वंदना कर सकते हैं। इसके पश्चात ही मंत्र-जप तथा संपूर्ण साधना-क्रम आरंभ करना चाहिए।।

मंत्र-जप की संपूर्ण विधि।। Complete Method Of Mantra Japa.

मित्रों, मंत्र-जप साधना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा केंद्रीय अंग माना जाता है। अतः इसकी विधि का विधिवत पालन करना भी अत्यंत आवश्यक होता है। जप के लिए सर्वप्रथम एक निश्चित संख्या निर्धारित करनी चाहिए। जैसे एक माला अर्थात एक सौ आठ बार, अथवा साधक की क्षमता के अनुसार इससे अधिक संख्या। जप सदैव स्फटिक, रुद्राक्ष अथवा कमल-गट्टे की माला से ही करना चाहिए। तथा माला को कभी भी तर्जनी अंगुली से स्पर्श नहीं करना चाहिए। क्योंकि इसे शास्त्रों में अशुभ माना गया है।।

जप करते समय मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए। तथा मन, वचन एवं कर्म की एकाग्रता बनाए रखनी चाहिए। मंत्र का उच्चारण ना तो अत्यंत तीव्र स्वर में करना चाहिए, और ना ही इतना मंद कि स्वयं को भी सुनाई ना दे। अपितु मध्यम तथा स्पष्ट स्वर में करना चाहिए। जिसे शास्त्रों में उपांशु-जप कहा जाता है। प्रतिदिन एक निश्चित समय पर, विशेष रूप से ब्रह्म-मुहूर्त अथवा संध्या-काल में जप करना सर्वाधिक फलदायी माना जाता है। तथा नौ दिनों तक इसी समय तथा इसी संख्या में निरंतरता बनाए रखना साधना की सिद्धि के लिए अनिवार्य शर्त मानी जाती है।।

साधना-काल में पालन करने योग्य नियम।। Rules To Be Followed During Sadhana.

मित्रों, साधना-काल के नौ दिनों में कुछ विशेष नियमों का कठोरता से पालन करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। अन्यथा साधना अधूरी अथवा निष्फल भी हो सकती है। साधक को इस अवधि में सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए। तथा तामसिक भोजन, मदिरा तथा प्याज़-लहसुन का सेवन पूर्णतः त्याग देना चाहिए। इसके साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन, सत्य-वचन तथा क्रोध-त्याग भी साधना की सफलता के लिए अनिवार्य नियम माने जाते हैं।।

इसके अतिरिक्त साधना-काल में साधक को अपना निश्चित आसन, निश्चित दिशा तथा निश्चित समय कभी परिवर्तित नहीं करना चाहिए। साधना के बीच में किसी से व्यर्थ वार्तालाप करना, क्रोध करना अथवा नकारात्मक विचारों में उलझना भी साधना की ऊर्जा को क्षीण कर देता है। यदि किसी कारणवश एक दिन का जप अधूरा रह जाए, तो अगले दिन उसे पूर्ण करने का प्रयास करना चाहिए। परंतु संपूर्ण नौ दिनों की निरंतरता को किसी भी स्थिति में भंग नहीं होने देना चाहिए। क्योंकि निरंतरता ही सिद्धि की आधारशिला मानी जाती है।।

सिद्धि के लक्षण एवं संकेत।। Signs And Indications Of Siddhi.

मित्रों, जब साधना विधिवत तथा श्रद्धापूर्वक संपन्न होती जाती है। तो साधक को कुछ विशेष लक्षण स्वतः ही अनुभव होने लगते हैं। जिन्हें शास्त्रों में सिद्धि के संकेत माना गया है। साधक के मन में असाधारण शांति, आत्मविश्वास तथा स्थिरता का अनुभव होने लगता है। तथा उसके स्वप्नों में भी शुभ तथा दिव्य दृश्य दिखाई देने लगते हैं। जैसे देवी का दर्शन, कमल-पुष्प अथवा दीपक की ज्योति।।

इसके साथ ही साधक के शरीर में हल्कापन, मन में एकाग्रता की वृद्धि, तथा जप के दौरान स्वाभाविक रूप से आनंद अथवा रोमांच का अनुभव होना भी सिद्धि के प्रारंभिक लक्षण माने जाते हैं। परन्तु यह ध्यान रहे कि इन लक्षणों के प्रकट होने पर भी साधक को साधना के मध्य में अहंकार अथवा उतावलेपन का भाव नहीं लाना चाहिए। अपितु संपूर्ण नौ दिनों तक सम्मान श्रद्धा तथा संयम के साथ साधना को पूर्ण करना चाहिए। तभी सिद्धि स्थायी तथा पूर्ण रूप धारण करती है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, दुर्गा-सप्तशती तथा देवी भागवत पुराण में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि नवरात्रि-काल में की गई मंत्र-साधना सामान्य दिनों की अपेक्षा सहस्रगुणा फलदायी होती है। क्योंकि इस काल में माँ भगवती की संपूर्ण शक्ति पृथ्वी-लोक पर अत्यंत सक्रिय रहती है।।

कुलार्णव तंत्र में भी यह उल्लेख मिलता है कि संकल्प, गुरु-स्मरण, नियमित आसन-स्थान तथा निर्धारित संख्या में किया गया जप ही सिद्धि प्रदान करता है। तथा इनमें से किसी एक नियम का भी उल्लंघन होने पर साधना अपूर्ण रह जाती है। मंत्र-महार्णव में भी साधना-काल में सात्विक आचरण तथा निरंतरता को सिद्धि की अनिवार्य शर्त बताया गया है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. नवरात्रि में साधना करने का सबसे उत्तम समय कौन सा है।। What Is The Best Time To Perform Sadhana During Navratri.

उत्तर:- ब्रह्म-मुहूर्त अथवा संध्या-काल, दोनों ही समय साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माने जाते हैं। तथा प्रतिदिन एक ही निश्चित समय का पालन करना चाहिए।।

प्रश्न 2. साधना के लिए कौन सा आसन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।। Which Aasan Is Most Suitable For Sadhana.

उत्तर:- लाल अथवा पीले रंग का ऊनी अथवा कुशा का आसन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। जिसे किसी अन्य के साथ साझा नहीं करना चाहिए।।

प्रश्न 3. यदि साधना के बीच में एक दिन का जप अधूरा रह जाए, तो क्या करना चाहिए।। What Should Be Done If A Day's Japa Remains Incomplete.

उत्तर:- अगले दिन उसे यथासंभव पूर्ण करने का प्रयास करना चाहिए। परंतु संपूर्ण नौ दिनों की निरंतरता को भंग नहीं होने देना चाहिए।।

प्रश्न 4. सिद्धि प्राप्त होने के क्या लक्षण होते हैं।। What Are The Signs Of Attaining Siddhi.

उत्तर:- मन में असाधारण शांति, आत्मविश्वास, स्वप्नों में शुभ दृश्य तथा जप के दौरान स्वाभाविक आनंद का अनुभव होने लगता है। यह सभी सिद्धि के प्रारंभिक लक्षण माने जाते हैं।।

प्रश्न 5. क्या बिना गुरु-दीक्षा के भी साधना सिद्ध हो सकती है।। Can Sadhana Be Accomplished Without Guru Diksha.

उत्तर:- हाँ, जिन साधकों को दीक्षा-गुरु प्राप्त ना हो, वे परमगुरु अर्थात भगवान शिव अथवा माँ आदिशक्ति का स्मरण करके भी गुरु-वंदना संपन्न कर सकते हैं।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, नवरात्रि के नौ दिवसीय काल में संकल्प, उचित स्थान एवं आसन का चयन, गुरु-स्मरण, विधिवत मंत्र-जप तथा नियमों के कठोर पालन से की गई साधना निश्चित रुप से सिद्धि प्रदान करती है। यह काल स्वयं माँ भगवती की कृपा से साधक के लिए विशेष रूप से अनुकूल बना रहता है। अतः इस अवसर का भरपूर तथा सही उपयोग करने वाला साधक निश्चित ही अपनी मनोकामना की पूर्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति, दोनों प्राप्त करता है।।

और यहाँ मैं यही कहूँगा कि साधना चाहे जितनी भी सरल अथवा कठिन क्यों ना हो, श्रद्धा, संयम तथा निरंतरता के बिना कोई भी साधना सिद्ध नहीं होती। बाह्य आडंबर की अपेक्षा आंतरिक समर्पण तथा सच्ची भक्ति-भावना ही सिद्धि की वास्तविक कुंजी मानी जाती है। परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि इस प्रकार की किसी भी विशेष साधना अथवा मंत्र-जप को आरंभ करने से पूर्व किसी विद्वान, योग्य, अनुभवी वैदिक गुरु अथवा आचार्य से विधिपूर्वक मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करना चाहिए। ताकि साधना में किसी प्रकार की त्रुटि ना रह जाए, तथा माता की पूर्ण कृपा प्राप्त हो सके।।

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