पूजन विधि के लिये कुछ उपयुक्त सूत्र ।।

पूजन विधि के लिये कुछ उपयुक्त सूत्र ।। Anushthan Ke Lie Upayukta Sutra.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, प्रायः प्रत्येक मङ्ल कार्य में पञ्चाङ्ग पूजन अपेक्षित है । कोई भी कार्यारम्भ से पूर्व गौरी गणेश, कलश, मातृका, घृतमातृका, नवग्रह, पञ्चलोकपाल, दशदिग्पाल, योगिनी आदि देवों की पूजा की जाती है ।।

पुण्याहवाचन एवं साङ्कल्पिक नान्दी श्राद्ध पूजनोपरान्त प्रधान देव पूजन, जैसे विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य आदि देवों की यथाविधि पूजन की जानी चाहिए ।।

व्रतोद्यापन एवं विशेष अनुष्ठान के समय यज्ञपीठ की स्थापना का विशेष महत्त्व होता है, अतः प्रधान देवता की पीठ रचना पूर्वाभिमुख पूर्व दिशा के मध्य में की जाय । ईशान कोण में ग्रह, मातृका, घृतमातृका, योगिनी अग्निकोण में वास्तु नैऋत्य में क्षेत्रपाल वायव्य कोण में ग्रह आदि देवों की कलश स्थापन पूर्वक पीठ रचना अपेक्षित है ।।

उपर्युक्त पीठ रचना के प्रकार विभिन्न रंगों के अक्षत या विविध रंग के अन्न के दानों से की जाती है । सभी व्रतोद्यापन-अनुष्ठान में-सर्वतोभद्रपीठ विशेष रूप से शिवपूजन में चतुर्लिङ्तोभद्रपीठ की रचना की जाती है । चक्र के रेखाचित्रों से उसका अभ्यास करना चाहिए ।।

प्रधान देवों की मूर्तियां यथाशक्ति स्वर्ण-रजत-ताम्र आदि धातुओं की बननी चाहिए और विधिपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करके उनका अर्चन किया जाना चाहिए ।।

अर्चना और पूजोपकरण-पूजन के अनेक प्रकार प्रचलित हैं और शास्त्रों में पञ्चोपचार, षोडशोपचार शतोपचार आदि विविध वस्तुओं से अर्चना के विधि विधान की विस्तार से चर्चा है । श्रद्धा-भक्ति-शक्ति के अनुसार उनका संग्रह करना चाहिए । देव पूजन में भावशुद्धि अपेक्षित है और पितृकार्य में वाक्य शुद्धि अपेक्षित होती है- "पितरः वाक्यमिच्छन्ति भावमिच्छन्ति देवताः" अतः संकल्प मंत्र की शुद्धि संस्कृत भाषा के अभ्यास से ही प्राप्त हो सकती है ।।

महर्षि पतञ्जलि ने महाभाष्य में बताया है, जैसे लकड़ी के भीतर रहने वाली आग बिना अग्नि के संपर्क के बाहर नहीं आती वैसे मंत्र की शक्ति अर्थज्ञान के बिना प्रभावी नहीं होती । उसी प्रकार शुद्ध वाक्य की रचना के बिना अभीष्ट फल की प्राप्ति भी नहीं हो सकती । इसलिए मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनका अर्थज्ञान अवश्य होना चाहिए ।।

बहुत से वैदिक मंत्र सन्दर्भ सूचक होकर भी तत्-तत् देवताओं के आवाहन अर्चन के लिए प्रयुक्त होते हैं जिसका मीमांसाशास्त्र के ऋषियों ने उनका समर्थन भी किया है । मीमांसा शास्त्र के मनीषियों ने तर्क सम्मत विचारों के बाद सिद्ध किया है कि मंत्र ही देवता हैं । यदि मंत्र नहीं तो देवता भी उपस्थित नहीं होंगे इसलिए मंत्रों की ही महिमा सर्वोपरि है ।।

यज्ञकर्ता यजमान और पौरोहित्य कर्म में संलग्न आचार्य को तद्रूप होकर ही पूजन-अर्चन करवाना चाहिए जिससे सिद्धियां प्राप्त होती है । 'देवो भूत्वा देवं यजेत्' ऐसा निर्देश लक्षित करता है कि तन्मयता और भावशुचिता से ही अभीष्ट सिद्धि होती है ।।

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।।। नारायण नारायण ।।।

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