शुक्र ग्रह अनुकूल हो तो लक्ष्मी की सम्पूर्ण कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है, कैसे आइये जानें ।।

शुक्र ग्रह अनुकूल हो तो लक्ष्मी की सम्पूर्ण कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है, कैसे आइये जानें ।। Shubh Sukra Lakshmi Ki Sampurn Kripa Deta Hai.

 

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,


मित्रों, शुक्रवार माता लक्ष्मी का दिन माना गया है । सामान्य रूप से शुक्र मौज-मस्ती, सुख-ऐश्वर्य, भोग-विलास से सम्बंधित ग्रह माना गया है । शुक्र एक शुभ फलदायी ग्रह है और सादगी का कारक ग्रह भी माना जाता है । सामान्यतया शुक्र कम ही मारक होता है और अगर हुआ तो इन्हीं क्षेत्रों को नुकशान पहुँचाता है । कोई भी ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में ही शुभ या अशुभ फल देता है ।।

जन्मकुण्डली में शुक्र स्वराशि, मित्र राशि, उच्च राशि तथा नवांश का होकर शुभ भावाधिपति हो, षड्बली हो, शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो तो शुक्र की शुभ दशा में सुख साधनों में वृद्धि, वाहन सुख, धन ऐश्वर्य, विवाह सुख, स्त्री सुख, विद्या लाभ, पालतू पशुओं की वृद्धि, सरकार से सम्मान की प्राप्ति, गीत-संगीत एवं अन्य ललित कलाओं में रूचि का होना, घर में उत्सव, नष्ट राज्य या धन का लाभ करवाता है ।।

मित्रों, शुभ शुक्र मित्र-बन्धु बांधवों से समागम करवाता है, घर में लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है । जातक का आधिपत्य, उत्साह वृद्धि, यश-कीर्ति का विस्तार, श्रृंगार में रूचि, नाटक-काव्य एवं रसिक साहित्य और मनोरंजन में आकर्षण, कन्या सन्तति की संभावना होती है । चांदी, चीनी, चावल, दूध एवं दूध से बने पदार्थ, वस्त्र, सुगन्धित द्रव्य, वाहन सुख भोग के साधन, आभूषण, फैंसी आइटम्स इत्यादि के क्षेत्र में लाभ होता है ।।

सरकारी नौकरी में पदोन्नति होती है, रुके हुए कार्य पूर्ण हो जाते हैं । जिस भाव का स्वामी शुक्र होता है उस भाव से सम्बन्धित कार्यों एवं पदार्थों में सफलता तथा उसका लाभ होता है । यदि शुक्र अस्त एवं नीच का हो, शत्रु राशि में नवांश का हो, षड्बल विहीन हो, अशुभ भावाधिपति और पाप ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो तो शुक्र की अशुभ दशा में विवाह व दाम्पत्य सुख में बाधा आती है ।।

मित्रों, ऐसा शुक्र धन की हानि, घर में चोरी का भय, गुप्तांगों में रोग, स्वजनों से द्वेष, व्यवसाय में बाधा, पशु धन की हानि, सिनेमा एवं अश्लील साहित्य अथवा काम वासना की ओर ध्यान लगे रहने के कुप्रभाव से शिक्षा प्राप्ति में बाधायें आती हैं । कुण्डली में शुक्र जिस भाव का स्वामी होता है उस भाव से सम्बन्धित कार्यों एवं पदार्थों में असफलता और हानि का सामना करना पड़ता है ।।
 

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।।। नारायण नारायण ।।।
 
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