ग्रहण काल में करें इन मन्त्रों की सिद्धि और धन-धान्य से पूर्ण जीवन प्राप्त करें ।।

ग्रहण काल में करें इन मन्त्रों की सिद्धि और धन-धान्य से पूर्ण जीवन प्राप्त करें ।। Mantra Siddhi for Grahana Kaal for Luxurious Life.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, आज के इस आर्टिकल को आज आप अन्ततक पढ़ें । बात करते हैं, सर्वप्रथम ग्रहण में क्या करना चाहिये ? और क्या नहीं करना चाहिये ? इस विषय पर गम्भीरता से चिंतन करें । मैं इस दौरान आपलोगों को उन प्रभावी मन्त्रों के विषय में भी विस्तार से बताउँगा जिसकी सिद्धि से आप अपने जीवन को मनचाही दिशा प्रदान कर सकते हैं ।।

चन्द्र ग्रहण का पूर्ण विवरण इस लिंक पर पढ़ें :: 27 जुलाई के चन्द्रग्रहण का समय, सावधानियाँ एवं राशिफल ।।

चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण धार्मिक द्रष्टि से बहुत महत्व रखते है । ग्रहण काल का समय जहाँ गर्भवती महिलाओं, बीमारों और वृद्धों के लिए अशुभ संकेत देने वाला माना गया है । वहीं साधकों के लिए ग्रहण काल एक सुनहरे अवसर के रूप में आता है ।।

बड़े-बड़े साधक लम्बे समय से ग्रहण काल का इन्तजार करते है ताकि उस समय वे अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त कर सकें । धर्म शास्त्रों के अनुसार ग्रहण काल में किये गये मंत्र जप और यज्ञ से 100 गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है और शीघ्र ही मंत्र भी सिद्ध (Chandra Grahan me Mantra Siddhi) हो जाते हैं ।।

चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से किये गये सत्कर्मों का कई गुना ज्यादा फल होता है । कोई भी व्यक्ति ग्रहण के समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके “ॐ नमो नारायणाय” इस मंत्र का आठ हजार जप करके ग्रहणशुद्धि होने पर उस घृत को पी जाय । ऐसा करने से वह मेधाशक्ति और कवित्वशक्ति तथा वाक् सिद्धि प्राप्त कर लेता है ।।

मित्रों, परन्तु सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक “अन्धकूप” नरक में वास करता है । सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर (12 घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर (9) घंटे पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए ।।

परन्तु बूढ़े, बालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक भोजन कर सकते हैं । ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुशा या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते । पके हुआ अन्न जो बच जाय उसका त्याग करके उसे गाय, कुत्ते आदि को डाल देना चाहिए तथा स्वयं के लिए ताजा भोजन बनाना चाहिए ।।

ग्रहण वेध के प्रारम्भ में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग कर सकते हैं वो भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही । बाकी ग्रहण के शुरूआत से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिए । ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और श्राद्ध तथा अंत में सचैल (वस्त्रसहित) स्नान करना चाहिए ।।

स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं । ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो उसका शुद्ध बिम्ब देखकर एवं कुछ दान करने के बाद ही भोजन करना चाहिए । ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए ।।

ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए । ग्रहण के स्नान में गरम जल की अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा जमीन में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, (साधारण) बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का, अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है ।।

ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरूरतमंदों को वस्त्रदान आदि करना चाहिए इससे अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है । ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल आदि नहीं तोड़ने चाहिए । बाल तथा वस्त्रादि भी नहीं निचोड़ने चाहिए एवं दंतधावन भी नहीं करना चाहिए ।।

ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल-मूत्रादि का त्याग, मैथुन और भोजन ये सभी कार्य वर्जित होते हैं । ग्रहण के समय कोई भी शुभ अथवा नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए । ग्रहण के समय सोने से व्यक्ति रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन आदि लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है ।।

गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए । तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल होता है, किन्तु संतानयुक्त गृहस्थ को ग्रहण और संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिए ।।

शास्त्र कहता है, कि सामान्य दिनों में किये गये पुण्यकर्मों से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना शुभफल देता है एवं सूर्यग्रहण में किया गया पुण्यकर्म दस लाख गुना शुभ फलदायी होता है ।।

यदि गंगाजल पास में हो तो उसे स्नान के जल में डालकर स्नानोपरान्त कर्म करने से चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में किया गया पुण्यकर्म दस करोड़ गुना शुभफलदायक होता है । ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम का भी जप किया जा सकता है, जिसकी सिद्धि हो जाती है ।।

फिर उस सिद्धि का उपयोग हम किसी भी कार्य हेतु कर सकते हैं । ऐसा न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है और साधारण जप का भी फल बहुत कम प्राप्त होता है । आज का ये पोस्ट उन सभी के लिए है जो अपना भविष्य बेहतर बनाना चाहते है ।।

सभी को स्वयं के भविष्य का चिंता होना चाहिए ताकि जीवन मे दुख और दर्द कम हो । चलिये अब आगे बढ़ते हुए हम लोग साधना पर बात करते है । यह साधना ग्रहण काल में शुरू करने से सफलता निश्चित मानी जाती है । इस साधना को प्रामाणिकता से करो तो आपका जीवन वर्तमान जीवन से बेहतर हो जाएगा ।।

साधना के फायदे – चंद्रग्रहण के अवसर पर सरस्वती मन्त्र की साधना से स्मरणशक्ति बढ़ती है । लक्ष्मी मन्त्र से व्यवसाय में वृद्धि होती है । नारायण मन्त्र से सरकारी नौकरी कन्फर्म हो जाती है बल्कि उनके लिये तो यह साधना अमृत के सामान होती है ।।

भगवान शिव या देवी की साधना से स्वयं का भूत-भविष्य-वर्तमान भी देखा जा सकता है । वैसे यह तो किसी भी देवता-देवी के मन्त्रों कि साधना से संभव हो जाता है । इतना ही नहीं अपने अलावा किसी दूसरों का भी भाग्य हम सहजता पूर्वक देख सकते हैं ।।

परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि ग्रहण के अवसर पर किसी दूसरे का अन्न नहीं खाना चाहिये । क्योंकि ऐसा करने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सारा पुण्य भोजन करवाने वाले प्राप्त हो जाता है, (स्कन्द पुराण) । भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को किसी भी कार्य हेतु नहीं खोदना चाहिए, (देवी भागवत)।।

अस्त होते समय सूर्य और चन्द्रमा को नहीं देखना चाहिए इससे किसी गम्भीर बीमारी होने का डर होता है । चंद्रग्रहण पर किसी भी मंत्र का एक बार जप करने से एक लाख बार जप करने का पूण्य प्राप्त होता है । इसीलिए हमें आवश्यकतानुसार मंत्र साधना कर लेना चाहिए ।।

अथ मंत्र:-

पहला मंत्र – “ऊं क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते । देहि मे तनयं कृष्णं त्वामहं शरणं गतः क्लीं ऊं”।। यह मंत्र गर्भवती स्त्रियों के लिए विशेष लाभकारी होता है । महिलायें यदि स्फटिक या तुलसी की माला से ग्रहण काल के दौरान मंत्र का जप करें तो न सिर्फ उनका गर्भ ग्रहण दोष और राहु की छाया से बचा रहेगा ।।

बल्कि उन्हें स्वस्थ, सुंदर और बौद्धिक गुणों से युक्त संतान की प्राप्ति होगी । यह मंत्र उन लोगों को भी जपना चाहिए जो श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त करना चाहते हैं या पारिवारिक सुख उठाना चाहते हैं ।।

दूसरा मंत्र – “ऊं नमो भगवते वासुदेवाय”।। ग्रहण प्रारंभ होने पर अपने पूजा स्थान में पूर्वाभिमुख होकर पीले या लाल रंग के आसान पर बैठ जायें । स्फटिक की माला से इस मंत्र का जप करें । ग्रहण काल के दौरान 11, 21 या 31 माला मंत्र जप करें ।।

चाहे आप किसी भी राशि या लग्न वाले हों, यह मंत्र आपको ग्रहण जनित समस्त दुष्प्रभावों से बचाएगा । यह कार्यों में सिद्धि और भगवाण विष्णु की कृपा प्राप्त करने का मंत्र है । ग्रहण काल में इस मंत्र की सिद्धि हो जाती है । फिर जीवन में जब भी किसी संकट में हों इस मंत्र का जप करें कार्य जल्दी एवं निर्विघ्नता पूर्वक होने लगते हैं । बाधाएं समाप्त हो जाती हैं । अविवाहितों को श्रेष्ठ विवाह सुख प्रदान करता है यह मंत्र ।।

तीसरा मंत्र – “ऊं तत् स्वरूपाय स्वाहा”।। यह भगवान विष्णु का चमत्कारिक और शीघ्र प्रभाव दिखाने वाला मंत्र है । ग्रहण काल में उत्तर की ओर मुख करके पूजा स्थान में बैठ जाएं । भगवान विष्णु का मानसिक ध्यान करने के बाद तुलसी की माला से इस मंत्र का जप करें ।।

अपनी क्षमता के अनुसार 5, 11 या 21 माला जप करें । मंत्र जप के दौरान बीच में बिलकुल न बोलें । ग्रहण के बाद भी इस मंत्र को सुबह या शाम के समय जपें जीवन में समस्त प्रकार की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं ।।

चौथा मंत्र – “ऊं श्रीं आं ह्रीं सः”।। (वैसे लक्ष्मी अथवा समस्त देवियों के लिये सर्वाधिक प्रभावी मन्त्र – ॐ ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ।।) यह सौंदर्य लक्ष्मी का मंत्र है । ग्रहण काल में पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं । मन में महालक्ष्मी का ध्यान करें और मंत्र जप करें ।।

स्फटिक की माला से इस मंत्र का जप करें । मंत्र के प्रभाव से व्यक्ति के आकर्षण अथवा प्रभाव में वृद्धि होती है । दूसरे व्यक्ति उसकी बात मानने लगते हैं । मान-सम्मान, प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है । धन-संपदा में धीरे-धीरे वृद्धि होने लगती है ।।

पांचवां मंत्र – “ऊं तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्रः प्रचोदयात”।। यह शिव गायत्री मंत्र है । बल, साहस में वृद्धि करने, रोगों का नाश करने और निर्भय बनाने में इस मंत्र का कोई मुकाबला नहीं । इस मंत्र के जप के लिए पूर्व की ओर मुंह करके बैठ जाएं ।।

भगवान शिव का मानसिक ध्यान करें और रूद्राक्ष की माला से 5, 11 या 21 माला जप करें । ग्रहण के दोषों के अलावा इस मंत्र के प्रभाव से व्यक्ति समस्त प्रकार के रोगों से मुक्त हो जाता है । जीवन में परेशानियां उसके पास भी नहीं आती ।।

मित्रों, यदि आपके शत्रुओं की संख्या अधिक है और वह आपको परेशान करते हैं तो बगलामुखी का मंत्र जप करें । मंत्र इस प्रकार है- ऊँ ह्रीं ऐं श्रीं क्लीं श्री बगलानने ! मम् रिपुन नाशय-नाशय ममैश्वर्याणि देहि-देहि मनोवांछित कार्यं साधय-साधय ह्रीं स्वाहा ।।

वाक् सिद्धि हेतु- ॐ ह्रीं दूं दूर्गाय: नम: । लक्ष्मी प्राप्ति हेतु तांत्रिक मंत्र- ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं ॐ स्वाहा: । नौकरी एवं व्यापार में वृद्धि हेतु प्रयोग- माता लक्ष्मी के इस मंत्र का पूर्ण ग्रहणावधि तक लगातार जप करें- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम: ।।

मुकदमे में विजय के लिए- ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धि विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा ।। इसमें “सर्वदुष्टानां” की जगह जिससे छुटकारा पाना हो उसका नाम लें ।।

“ॐ श्रीं ह्रीं हसौ: हूं फट निलसरस्वत्यै स्वाहा ।। ग्रहण काल में इस मंत्र का ज्यादा से ज्यादा जप करें । दिशा उत्तर, आसन- सफेद या नीले रंग के वस्त्र, माला स्फटिक या नीले हकीक का और माला नहीं हो तो भी बिना गिनती किये भी जप कर सकते हैं ।।

ग्रहण साधना के बाद नित्य 21 दिनों तक रात्री में 9 बजे के बाद 11 माला जप या फिर 30 मिनट जप करें । यह सरस्वती साधना है, इसको बच्चे अगर कर लें तो बहुत कुछ अच्छा होगा । कोई मंत्र तभी सफल होता है, जब आप में पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास हो ।।

किसी का बुरा चाहने वाले मंत्र सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकते । मंत्र जपते समय एक खुशबूदार अगरबत्ती प्रज्ज्वलित कर लें । इससे मन एकाग्र होकर जप में मन लगता है तथा ध्यान भी नहीं भटकता है । साथ ही हो सके तो इस आर्टिकल के लिंक को अपने व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक ग्रुप या प्रोफाइल पर शेयर अवश्य करें ।।

क्योंकि इस साधना का सभी लाभ उठा सके । यह आर्टिकल जनकल्याण हेतु है और इसको आप शेयर करके सभी लोगों की मदद करेंगे यही मैं आप से उम्मीद रखता हूं । जिन लोगो को लिंक शेयर करने में शर्म आता है वह इसमें ना पड़े, आगे आपकी मर्जी ।।

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