विपरीत राजयोग एक बहुत ही प्रभावी राजयोग परन्तु कैसे?।। Viparit Rajyoga Ke Fal.
हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,
मित्रों, दोनो लग्नों से बने विपरीत राजयोग के फल पूर्ण रूप से मिलते हैं। "विपरीत राजयोग" बनाने वाले ग्रह कम अंशो पर, दुर्बल होने तथा उन पर दुष्प्रभाव के अनुपात में अधिकाधिक शुभ फल देते हैं। परन्तु शक्तिशाली पापी ग्रह अशुभ भावों में स्थित होने पर जातक की हानि ही करते हैं।।
ज्योतिष के सूत्रों के गूढ़ अध्ययन से यह समझ में आता है, कि जातक की जन्म कुण्डली में स्थित "राजयोग" उसके पूर्वजन्म के अच्छे कर्मों का फल होता है। जबकि "विपरीत राजयोग" पूर्व जन्म में अच्छे कार्य, परिश्रम एवं तात्कालिक सामाजिक आचार संहिता के पालन के बावजूद पीड़ित रहने वाले जातक की इस जन्म की कुण्डली में पाये जाते हैं।।
ऐसा जातक पूर्व जन्म में जिन लोगों द्वारा सताया गया था। उन्हीं लोगों की ओर से इस जन्म में उसके वर्तमान कर्मों का कई गुना अधिक फल दिया जाता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिये क्योंकि उसकी जन्मकुंडली में स्थित "विपरीत राजयोग" ही फलित हो रहा है और वही ऐसा फल दे रहा है।।
इस जन्म में "विपरीत राजयोग" के कारण जातक को अत्यल्प कर्म (पारिश्रमिक) का अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है। परन्तु पूर्व संस्कार-वश उसकी नियति परमार्थिक हो जाती है। जिससे मृत्योपरान्त उसकी ख्याति काफी समय तक रहती है। स्वाभाविक जिज्ञासा होती है, कि छठे और आठवें जैसे दुष्ट भावों के स्वामी किस प्रकार "विपरीत राजयोग" बनाकर जातक को लाभ पहुंचाते हैं।।
यह कार्य प्रणाली इस प्रकार है, लग्न भाव जातक को दर्शाता है। सप्तम भाव उस व्यक्ति को जिससे वह सम्बन्ध रखता है। छठा भाव सप्तम से द्वादश (व्यय) भाव है, तथा अष्टम भाव सप्तम से द्वितीय (धन) भाव है। सम्बन्धी व्यक्ति के 2 एवं 12 भावों का विनिमय उसकी हानि करता है। और उसका लाभ जातक को मिलता है।।
उदाहरण के लिये- जब जातक के कुंडली के छठे और आठवें भाव के स्वामियों की दशा-भुक्ति चल रही हो उस समय पर कोई व्यक्ति अपनी किसी मजबूरी के वजह से अपनी प्रोपर्टी कम मूल्य में जातक को बेच देता है। कुछ समय बाद उसकी कीमत अत्यधिक ऊँची हो जाती है और जातक उसे बेच कर बहुत अधिक लाभ कमा लेता है।।
छठे और आठवें भाव के स्वामी पापी ग्रह हों। साथ ही उन पर जितना अधिक पाप ग्रहों का पाप प्रभाव होगा। जातक को उतना ही अधिक शुभ फल प्राप्त होगा। जन्म कुण्डली में "विपरीत राजयोग" का उत्कृष्ट उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर सिंह की कुण्डली में मिलता है।।
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